श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 731, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- सुन्दरकाण्ड *
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राक्षसोंके समूह पतंगोंके समान और श्रीरघुनाथजीके बाण अग्निके समान हैं। हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और राक्षसोंको जला ही समझो ॥ १५ ॥
जों रघुबीर होती सुधि पाई। करते नहीं बिलंबु रघुराई ॥ राम बान रबि उएँ जानकी। तम बरुथ कहँ जातुधान की ॥
श्रीरामचन्द्रजीने यदि खबर पायी होती तो वे विलम्ब न करते। हे जानकीजी! रामबाणरूपी सूर्यके उदय होनेपर राक्षसोंकी सेनारूपी अन्धकार कहाँ रह सकता है? ॥ १ ॥
अबहिन मातु मैं जाऊँ लवाई। प्रभु आयसु नहीं राम दोहाई ॥ कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिन रघुबीरा ॥
हे माता! मैं आपको अभी यहाँसे लिवा जाऊँ; पर श्रीरामचन्द्रजीकी शपथ है, मुझे प्रभु (उन) की आज्ञा नहीं है। [अतः] हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्रीरामचन्द्रजी वानरोंसहित यहाँ आवेंगे ॥ २ ॥
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिन। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिन ॥ हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना ॥
और राक्षसोंको मारकर आपको ले जायेंगे। नारद आदि [ऋषि-मुनि] तीनों लोकोंमें उनका यश गावेंगे। [सीताजीने कहा—] हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान (नन्हें-नन्हें-से) होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान् योद्धा हैं ॥ ३ ॥
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा ॥ कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा ॥
अतः मेरे हृदयमें बड़ा भारी सन्देह होता है [कि तुम-जैसे बंदर राक्षसोंको कैसे जीतेंगे!] यह सुनकर हनुमान्जीने अपना शरीर प्रकट किया। सोनेके पर्वत (सुमेरु) के आकारका (अत्यन्त विशाल) शरीर था, जो युद्धमें शत्रुओंके हृदयमें भय उत्पन्न करनेवाला, अत्यन्त बलवान् और वीर था ॥ ४ ॥
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ ॥
तब (उसे देखकर) सीताजीके मनमें विश्वास हुआ। हनुमान्जीने फिर छोटा रूप धारण कर लिया ॥ ५ ॥
दो०—सुनु माता सारखामृग नहीं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाड़ परम लघु ब्याल ॥ १६ ॥
हे माता! सुनो, वानरोंमें बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परन्तु प्रभुके प्रतापसे बहुत छोटा सर्प भी गरुड़को खा सकता है (अत्यन्त निर्बल भी महान् बलवान्को मार सकता है) ॥ १६ ॥