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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 740, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 740

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  • रामचरितमानस *

देह बड़ी विशाल, परन्तु बहुत ही हलकी (फुर्तीली) है। वे दौड़कर एक महलसे दूसरे महलपर चढ़ जाते हैं। नगर जल रहा है, लोग बेहाल हो गये हैं। आगकी करोड़ों भयंकर लपटें झपट रही हैं ॥ १ ॥

तात मातु हा सुनिअ पुकारा । एहिं अवसर को हमहि उबारा ॥ हम जो कहा यह कपि नहीं होई । बानर रूप धरें सुर कोई ॥

हाय बप्पा! हाय मैया! इस अवसरपर हमें कौन बचावेगा? [चारों ओर] यही पुकार सुनायी पड़ रही है। हमने तो पहले ही कहा था कि यह वानर नहीं है, वानरका रूप धरे कोई देवता है! ॥ २ ॥

साधु अवग्या कर फलु ऐसा । जरइ नगर अनाथ कर जैसा ॥ जारा नगरु निमिष एक माहीं । एक बिभीषण कर गृह नाहीं ॥

साधुके अपमानका यह फल है कि नगर अनाथके नगरकी तरह जल रहा है। हनुमान्जीने एक ही क्षणमें सारा नगर जला डाला। एक बिभीषणका घर नहीं जलाया ॥ ३ ॥

ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा । जरा न सो तेहि कारन गिरिजा ॥ उलटि पलटि लंका सब जारी । कूदि परा पुनि सिंधु मझारी ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे पार्वती! जिन्होंने अग्निको बनाया, हनुमान्जी उन्हींके दूत हैं। इसी कारण वे अग्निसे नहीं जले। हनुमान्जीने उलट-पलटकर (एक ओरसे दूसरी ओरतक) सारी लङ्का जला दी। फिर वे समुद्रमें कूद पड़े ॥ ४ ॥

दो०—पूँछ बुझाइ खोड़ श्रम धरि लघु रूप बहोरि ।

जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि ॥ २६ ॥

पूँछ बुझाकर, थकावट दूर करके और फिर छोटा-सा रूप धारण कर हनुमान्जी श्रीजानकीजीके सामने हाथ जोड़कर जा खड़े हुए ॥ २६ ॥

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा । जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा ॥ चूड़ामनि उतारि तब दयऊ । हरष समेत पवनसुत लयऊ ॥

[हनुमान्जीने कहा—] हे माता! मुझे कोई चिह्न (पहचान) दीजिये, जैसे श्रीरघुनाथजीने मुझे दिया था। तब सीताजीने चूड़ामणि उतारकर दी। हनुमान्जीने उसको हर्षपूर्वक ले लिया ॥ १ ॥

कहेहु तात अस मोर प्रनामा । सब प्रकार प्रभु पूरनकामा ॥ दीन दयाल बिरिदु संभारी । हरहु नाथ मम संकट भारी ॥

[जानकीजीने कहा—] हे तात! मेरा प्रणाम निवेदन करना और इस प्रकार कहना—हे प्रभु! यद्यपि आप सब प्रकारसे पूर्णकाम हैं (आपको किसी प्रकारकी कामना नहीं है), तथापि दीनों (दुखियों) पर दया करना आपका विरद है [और मैं दीन हूँ] अतः उस विरदको याद करके, हे नाथ! मेरे भारी संकटको दूर कीजिये ॥ २ ॥

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