श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 749, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- सुन्दरकाण्ड *
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उहाँ निसाचर रहहिं ससंका । जब तें जारि गयउ कपि लंका ॥ निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा । नहिं निसिचर कुल केर उबारा ॥
वहाँ (लङ्कामें) जबसे हनुमान्जी लङ्काको जलाकर गये, तबसे राक्षस भयभीत रहने लगे। अपने-अपने घरोंमें सब विचार करते हैं कि अब राक्षसकुलकी रक्षा [का कोई उपाय] नहीं है ॥ १ ॥
जासु दूत बल बरनि न जाई । तेहि आएँ पुर कवन भलाई ॥ दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी । मंदोदरी अधिक अकुलानी ॥
जिसके दूतका बल वर्णन नहीं किया जा सकता, उसके स्वयं नगरमें आनेपर कौन भलाई है (हमलोगोंकी बड़ी बुरी दशा होगी) ? दूतियोंसे नगरनिवासियोंके वचन सुनकर मन्दोदरी बहुत ही व्याकुल हो गयी ॥ २ ॥
रहसि जोरि कर पति पग लागी । बोली बचन नीति रस पागी ॥ कंत करष हरि सन परिहरहू । मोर कहा अति हित हियँ धरहू ॥
वह एकान्तमें हाथ जोड़कर पति (रावण) के चरणों लगी और नीतिरसमें पगी हुई वाणी बोली—हे प्रियतम! श्रीहरिसे विरोध छोड़ दीजिये। मेरे कहनेको अत्यन्त ही हितकर जानकर हृदयमें धारण कीजिये ॥ ३ ॥
समुद्भत जासु दूत कइ करनी । स्वर्वाहिं गर्भ रजनीचर घरनी ॥ तासु नारि निज सचिव बोलाई । पठवहु कंत जो चहहु भलाई ॥
जिनके दूतकी करनीका विचार करते ही (स्मरण आते ही) राक्षसोंकी स्त्रियोंके गर्भ गिर जाते हैं, हे प्यारे स्वामी! यदि भला चाहते हैं, तो अपने मन्त्रीको बुलाकर उसके साथ उनकी स्त्रीको भेज दीजिये ॥ ४ ॥
तव कुल कमल बिपिन दुखदाई । सीता सीत निसा सम आई ॥ सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें । हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें ॥
सीता आपके कुलरूपी कमलोंके वनको दुःख देनेवाली जाड़ेकी रात्रिके समान आयी है। हे नाथ! सुनिये, सीताको दिये (लौटाये) बिना शम्भु और ब्रह्माके किये भी आपका भला नहीं हो सकता ॥ ५ ॥
दो०—राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक ।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक ॥ ३६ ॥
श्रीरामजीके बाण सर्पोंके समूहके समान हैं और राक्षसोंके समूह मेढकके समान। जबतक वे इन्हें ग्रस नहीं लेते (निगल नहीं जाते) तबतक हठ छोड़कर उपाय कर लीजिये ॥ ३६ ॥