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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 770, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 770

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  • रामचरितमानस *

दो०— सुनत विनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ । जेहि बिधि उत्तै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ ॥ ५९ ॥

समुद्रके अत्यन्त विनीत वचन सुनकर कृपालु श्रीरामजीने मुसकराकर कहा—हे तात! जिस प्रकार वानरोंकी सेना पार उत्तर जाय, वह उपाय बताओ ॥ ५९ ॥

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई । लरिकाई रिषि आसिष पाई ॥ तिन्ह कें परस किऐं गिरि भारे । तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे ॥

[समुद्रने कहा—] हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई हैं। उन्होंने लड़कपनमें ऋषिसे आशीर्वाद पाया था। उनके स्पर्श कर लेनेसे ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रतापसे समुद्रपर तैर जायेंगे ॥ १ ॥

मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई । करिहउँ बल अनुमान सहाई ॥ एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ । जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ ॥

मैं भी प्रभुकी प्रभुताको हृदयमें धारण कर अपने बलके अनुसार (जहाँतक मुझसे बन पड़ेगा) सहायता करूँगा। हे नाथ! इस प्रकार समुद्रको बँधाइये, जिससे तीनों लोकोंमें आपका सुन्दर यश गाया जाय ॥ २ ॥

एहिं सर मम उत्तर तट बासी । हतहु नाथ खल नर अघ रासी ॥ सुनि कृपाल सागर मन पीरा । तुरतिहिं हरी राम रनधीरा ॥

इस बाणसे मेरे उत्तर तटपर रहनेवाले पापके राशि दुष्ट मनुष्योंका वध कीजिये। कृपालु और रणधीर श्रीरामजीने समुद्रके मनकी पीड़ा सुनकर उसे तुरंत ही हर लिया (अर्थात् बाणसे उन दुष्टोंका वध कर दिया) ॥ ३ ॥

देखि राम बल पौरुष भारी । हरषि पयोनिधि भयउ सुरखारी ॥ सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा । चरन बंदि पाथोधि सिधावा ॥

श्रीरामजीका भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित होकर सुरखी हो गया। उसने उन दुष्टोंका सारा चरित्र प्रभुको कह सुनाया। फिर चरणोंकी वन्दना करके समुद्र चला गया ॥ ४ ॥

छं०— निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ । यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ ॥ सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना । तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना ॥