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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 775, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 775
  • लङ्काकाण्ड *

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परन्तु आपके शत्रुओंकी स्त्रियोंके औंसुओंकी धारासे यह फिर भर गया और उसीसे खारा भी हो गया। हनुमानजीकी यह अत्युक्ति (अलङ्कारपूर्ण युक्ति) सुनकर वानर श्रीरघुनाथजीकी ओर देखकर हर्षित हो गये ॥ २ ॥

जामवंत बोले दोउ भाई। नल नीलहि सब कथा सुनाई॥ राम प्रताप सुमिरि मन माहीं। करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं॥

जाम्बवान्ने नल-नील दोनों भाइयोंको बुलाकर उन्हें सारी कथा कह सुनायी [और कहा—] मनमें श्रीरामजीके प्रतापको स्मरण करके सेतु तैयार करो, [रामप्रतापसे] कुछ भी परिश्रम नहीं होगा ॥ ३ ॥

बोलि लिए कपि निकर बहोरी। सकल सुनहु बिनती कछु मोरी॥ राम चरन पंकज उर धरहू। कौतुक एक भालु कपि करहू॥

फिर वानरोंके समूहको बुला लिया [और कहा—] आप सब लोग मेरी कुछ विनती सुनिये। अपने हृदयमें श्रीरामजीके चरण-कमलोंको धारण कर लीजिये और सब भालू और वानर एक खेल कीजिये ॥ ४ ॥

धावहु मर्कट बिकट बरुथा। आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा॥ सुनि कपि भालु चले करि हूहा। जय रघुबीर प्रताप समूहा॥

विकट वानरोंके समूह (आप) दौड़ जाइये और वृक्षों तथा पर्वतोंके समूहोंको उखाड़ लाइये। यह सुनकर वानर और भालू हूह (हुंकार) करके और श्रीरघुनाथजीके प्रतापसमूहकी [अथवा प्रतापके पुंज श्रीरामजीकी] जय पुकारते हुए चले ॥ ५ ॥

दो०—अति उत्तंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ। आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ॥ १ ॥

बहुत ऊँचे-ऊँचे पर्वतों और वृक्षोंको खेलकी तरह ही [उखाड़कर] उठा लेते हैं और ला-लाकर नल-नीलको देते हैं। वे अच्छी तरह गढ़कर [सुन्दर] सेतु बनाते हैं ॥ १ ॥

सैल बिसाल आनि कपि देहीं। कंदुक इव नल नील ते लेहीं॥ देखि सेतु अति सुंदर रचना। बिहसि कृपानिधि बोले बचना॥

वानर बड़े-बड़े पहाड़ ला-लाकर देते हैं और नल-नील उन्हें गेंदकी तरह ले लेते हैं। सेतुकी अत्यन्त सुन्दर रचना देखकर कृपासिन्धु श्रीरामजी हँसकर वचन बोले— ॥ १ ॥

परम रम्य उत्तम यह धरनी। महिमा अमित जाइ नहिं बरनी॥ करिहउँ इहाँ संभु थापना। मोरे हृदयँ परम कलपना॥