श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 779, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
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घूमते-फिरते जहाँ कहीं किसी राक्षसको पा जाते हैं तो सब उसे घेरकर खूब नाच नचाते हैं और दाँतोंसे उसके नाक-कान काटकर, प्रभुका सुयश कहकर [अथवा कहलाकर] तब उसे जाने देते हैं ॥ ४ ॥
जिन्ह कर नासा कान निपाता । तिन्ह रावनहि कही सब बाता ॥ सुनत श्रवन बारिधि बंधाना । दस मुख बोलि उठा अकुलाना ॥
जिन राक्षसोंके नाक और कान काट डाले गये, उन्होंने रावणसे सब समाचार कहा। समुद्र [पर सेतु] का बाँधा जाना कानोंसे सुनते ही रावण घबड़ाकर दसों मुखोंसे बोल उठा— ॥ ५ ॥
दो०—बाँध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु वारीस । सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस ॥ ५ ॥
वननिधि, नीरनिधि, जलधि, सिंधु, वारीश, तोयनिधि, कंपति, उदधि, पयोधि, नदीशको क्या सचमुच ही बाँध लिया? ॥ ५ ॥
निज विकलता बिचारि बहोरी । बिहँसि गयउ गृह करि भय भोरी ॥ मन्दोदरीं सुन्यो प्रभु आयो । कौतुकहीं पाथोधि बँधायो ॥
फिर अपनी व्याकुलताको समझकर [ऊपरसे] हँसता हुआ, भयको भुलाकर रावण महलको गया। [जब] मन्दोदरीने सुना कि प्रभु श्रीरामजी आ गये हैं और उन्होंने खेलमें ही समुद्रको बँधवा लिया है, ॥ १ ॥
कर गहि पतिहि भवन निज आनी । बोली परम मनोहर बानी ॥ चरन नाड़ सिरु अंचलु रोपा । सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा ॥
[तब] वह हाथ पकड़कर, पतिको अपने महलमें लाकर परम मनोहर वाणी बोली। चरणोंमें सिर नवाकर उसने अपना आँचल पसारा और कहा—हे प्रियतम! क्रोध त्यागकर मेरा वचन सुनिये ॥ २ ॥
नाथ बयरु कीजे ताही सों । बुधि बल सकिअ जीति जाही सों ॥ तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा । खलु खद्योत दिनकरहि जैसा ॥
हे नाथ! वैर उसीके साथ करना चाहिये जिससे बुद्धि और बलके द्वारा जीत सके। आपमें और श्रीरघुनाथजीमें निश्चय ही कैसा अन्तर है, जैसा जुगन् और सूर्यमें! ॥ ३ ॥
अति बल मधु कैटभ जेहिं मारे । महाबीर दितिसुत संघारे ॥ जेहिं बलि बाँधि सहसभुज मारा । सोड़ अवतरेउ हरन महि भारा ॥