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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 781, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 781
  • लङ्काकाण्ड *

७७९

दो०—अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंषित गात।

नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात ॥ ७ ॥

ऐसा कहकर, नेत्रोंमें [करुणाका] जल भरकर और पतिके चरण पकड़कर, काँपते हुए शरीरसे मन्दोदरीने कहा—हे नाथ! श्रीरघुनाथजीका भजन कीजिये, जिससे मेरा सुहाग अचल हो जाय ॥ ७ ॥

तब रावन मयसुता उठाई । कहै लाग खल निज प्रभुताई ॥ सुनु तैं प्रिया बृथा भय माना । जग जोधा को मोहि समाना ॥

तब रावणने मन्दोदरीको उठाया और वह दुष्ट उससे अपनी प्रभुता कहने लगा—हे प्रिये! सुन, तूने व्यर्थ ही भय मान रखा है। बता तो जगत्में मेरे समान योद्धा है कौन? ॥ १ ॥

बरुन कुबेर पवन जम काला । भुजबल जितेउँ सकल दिगपाला ॥ देव दनुज नर सब बस मोरें । कवन हेतु उपजा भय तोरें ॥

वरुण, कुबेर, पवन, यमराज आदि सभी दिक्पालोंको तथा कालको भी मैंने अपनी भुजाओंके बलसे जीत रखा है। देवता, दानव और मनुष्य सभी मेरे वशमें हैं। फिर तुझको यह भय किस कारण उत्पन्न हो गया? ॥ २ ॥

नाना बिधि तेहि कहेसि बुझाई । सभाँ बहोरि बैठ सो जाई ॥ मंदोदरीं हृदयँ अस जाना । काल बस्य उपजा अभिमाना ॥

मन्दोदरीने उसे बहुत तरहसे समझाकर कहा [किन्तु रावणने उसकी एक भी बात न सुनी] और वह फिर सभामें जाकर बैठ गया। मन्दोदरीने हृदयमें ऐसा जान लिया कि कालके वश होनेसे पतिको अभिमान हो गया है ॥ ३ ॥

सभाँ आड़ मंत्रिन्ह तेहिँ बूझा । करब कवन बिधि रिपु सैं जूझा ॥ कहहिँ सचिव सुनु निसिचर नाहा । बार बार प्रभु पूछहु काहा ॥

सभामें आकर उसने मन्त्रियोंसे पूछा कि शत्रुके साथ किस प्रकारसे युद्ध करना होगा? मन्त्री कहने लगे—हे राक्षसोंके नाथ! हे प्रभु! सुनिये, आप बार-बार क्या पूछते हैं? ॥ ४ ॥

कहहु कवन भय करिअ बिचारा । नर कपि भालु अहार हमारा ॥

कहिये तो [ऐसा] कौन-सा बड़ा भय है, जिसका विचार किया जाय? (भयकी बात ही क्या है?) मनुष्य और वानर-भालू तो हमारे भोजन [की सामग्री] हैं ॥ ५ ॥

दो०—सब के बचन श्रवन सुनि कह प्रहस्त कर जोरि।

नीति विरोध न करिअ प्रभु मंत्रिन्ह मति अति थोरि ॥ ८ ॥