श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 783, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
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यदि वे स्त्री पाकर लौट जायें, तब तो [व्यर्थ] झगड़ा न बढ़ाइये। नहीं तो (यदि न फिरें तो) हे तात! सम्मुख युद्धभूमिमें उनसे हठपूर्वक (डटकर) मार-काट कीजिये ॥ ९ ॥
यह मत जौँ मानहु प्रभु मोरा । उभय प्रकार सुजसु जग तोरा ॥ सुत सन कह दसकंठ रिसाई । असि मति सठ केहिं तोहि सिखाई ॥
हे प्रभो! यदि आप मेरी यह सम्मति मानेंगे, तो जगत्में दोनों ही प्रकारसे आपका सुयश होगा। रावणने गुस्सेमें भरकर पुत्रसे कहा—अरे मूर्ख! तुझे ऐसी बुद्धि किसने सिखायी ? ॥ १ ॥
अबहीं ते उर संसय होई । बेनुमूल सुत भयहु घमोई ॥ सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा । चला भवन कहि बचन कठोरा ॥
अभीसे हृदयमें सन्देह (भय) हो रहा है ? हे पुत्र! तू तो बाँसकी जड़में घमोई हुआ (तू मेरे वंशके अनुकूल या अनुरूप नहीं हुआ)। पिताकी अत्यन्त घोर और कठोर वाणी सुनकर प्रहस्त ये कड़े वचन कहता हुआ घरको चला गया ॥ २ ॥
हित मत तोहि न लागत कैसैं । काल बिबस कहुँ भेषज जैसैं ॥ संध्या समय जानि दससीसा । भवन चलेउ निरखत भुज बीसा ॥
हितकी सलाह आपको कैसे नहीं लगती (आपपर कैसे असर नहीं करती), जैसे मृत्युके वश हुए [रोगी] को दवा नहीं लगती। सन्ध्याका समय जानकर रावण अपनी बीसों भुजाओंको देखता हुआ महलको चला ॥ ३ ॥
लंका सिखर उपर आगारा । अति बिचित्र तहँ होइ अखारा ॥ बैठ जाइ तेहिं मंदिर रावन । लागे किंनर गुन गन गावन ॥
लंकाकी चोटीपर एक अत्यन्त विचित्र महल था। वहाँ नाच-गानका अखाड़ा जमता था। रावण उस महलमें जाकर बैठ गया। किन्नर उसके गुणसमूहोंको गाने लगे ॥ ४ ॥
बाजहिं ताल पखाउज बीना । नृत्य करहिं अपछरा प्रबीना ॥
ताल (करताल), पखावज (मृदंग) और बीणा बज रहे हैं। नृत्यमें प्रवीण अप्सराएँ नाच रही हैं ॥ ५ ॥
दो०—सुनासीर सत सरिस सो संतत करइ बिलास ।
परम प्रबल रिपु सीस पर तद्यपि सोच न त्रास ॥ १० ॥
वह निरन्तर सैकड़ों इन्द्रोंके समान भोग-विलास करता रहता है। यद्यपि [श्रीरामजी-सरीखा] अत्यन्त प्रबल शत्रु सिरपर है, फिर भी उसको न तो चिन्ता है और न डर ही है ॥ १० ॥