श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 813, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
८११
जानत परम दुर्ग अति लंका । प्रभु प्रताप कपि चले असंका ॥ घटाटोप करि चहुँ दिसि घेरी । मुखहिं निसान बजावहिं भेरी ॥
लङ्काको अत्यन्त श्रेष्ठ (अजेय) किला जानते हुए भी वानर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे निडर होकर चले। चारों ओरसे घिरी हुई बादलोंकी घटाकी तरह लङ्काको चारों दिशाओंसे घेरकर वे मुँहसे ही डंके और भेरी बजाने लगे ॥ ५ ॥
दो०—जयति राम जय लछिमन जय कपीस सुग्रीव ।
गर्जहिं सिंहनाद कपि भालु महा बल सींव ॥ ३९ ॥
महान् बलकी सीमा वे वानर-भालू सिंहके समान ऊँचे स्वरसे 'श्रीरामजीकी जय', 'लक्ष्मणजीकी जय', 'वानरराज सुग्रीवकी जय' ऐसी गर्जना करने लगे ॥ ३९ ॥
लंकाँ भयउ कोलाहल भारी । सुना दसानन अति अहँकारी ॥ देखहु बनरन्ह केरि ढिठाई । बिहँसि निसाचर सेन बोलाई ॥
लङ्कामें बड़ा भारी कोलाहल (कोहराम) मच गया। अत्यन्त अहङ्कारी रावणने उसे सुनकर कहा—वानरोंकी ढिठाई तो देखो ! यह कहते हुए हँसकर उसने राक्षसोंकी सेना बुलाई ॥ १ ॥
आए कीस काल के प्रेरे । छुधवांत सब निसिचर मेरे ॥ अस कहि अट्टहास सठ कीन्हा । गृह बैठें अहार बिधि दीन्हा ॥
बंदर कालकी प्रेरणासे चले आये हैं। मेरे राक्षस सभी भूखे हैं। विध्याताने इन्हें घर बैठे भोजन भेज दिया। ऐसा कहकर उस मूर्खने अट्टहास किया (वह बड़े जोरसे ठहाका मारकर हँसा) ॥ २ ॥
सुभट सकल चारिहुँ दिसि जाहू । धरि धरि भालु कीस सब खाहू ॥ उमा रावनहि अस अभिमाना । जिमि टिट्ठिभ खग सूत उताना ॥
[और बोला—] हे वीरो ! सब लोग चारों दिशाओंमें जाओ और रीछ-वानर सबको पकड़-पकड़कर खाओ। [शिवजी कहते हैं—] हे उमा! रावणको ऐसा अभिमान था जैसे टिटिहिरी पक्षी पैर ऊपरकी ओर करके सोता है [मानो आकाशको थाम लेगा] ॥ ३ ॥
चले निसाचर आयसु मागी । गहि कर भिंडिपाल बर साँगी ॥ तोमर मुद्रर परसु प्रचंडा । सूल कूपान परिघ गिरिखंडा ॥
आज्ञा माँगकर और हाथोंमें उत्तम भिंडिपाल, साँगी (बरछी), तोमर, मुद्रर, प्रचण्ड फरसे, शूल, दुधारी तलवार, परिघ और पहाड़ोंके टुकड़े लेकर राक्षस चले ॥ ४ ॥