श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 840, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
कुंभकरण मन दीख बिचारी । हति छन माझ निसाचर धारी ॥ भा अति कुब्द महाबल बीरा । कियो मृगनायक नाद गँभीरा ॥
कुम्भकर्णने मनमें विचारकर देखा कि श्रीरामजीने क्षणमात्रमें राक्षसी सेनाका संहार कर डाला। तब वह महाबली वीर अत्यन्त क्रोधित हुआ और उसने गम्भीर सिंहनाद किया ॥ १ ॥
कोपि महीधर लेड़ उपारी । डारड़ जहाँ मर्कट भट भारी ॥ आवत देखि सैल प्रभु भारे । सरन्हि काटि रज सम करि डारे ॥
वह क्रोध करके पर्वत उखाड़ लेता है और जहाँ भारी-भारी वानर योद्धा होते हैं, वहाँ डाल देता है। बड़े-बड़े पर्वतोंको आते देखकर प्रभुने उनको बाणोंसे काटकर धूलके समान (चूर-चूर) कर डाला ॥ २ ॥
पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक । छाँड़े अति कराल बहु सायक ॥ तनु महँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं । जिमि दामिनि घन माझ समाहीं ॥
फिर श्रीरघुनाथजीने क्रोध करके धनुषको तानकर बहुत-से अत्यन्त भयानक बाण छोड़े। वे बाण कुम्भकर्णके शरीरमें घुसकर [पीछेसे इस प्रकार] निकल जाते हैं [कि उनका पता नहीं चलता], जैसे बिजलियाँ बादलमें समा जाती हैं ॥ ३ ॥
सोनित स्वत सोह तन कारे । जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे ॥ बिकल बिलोकि भालु कपि धाए । बिहँसा जबहिं निकट कपि आए ॥
उसके काले शरीरसे रुधिर बहता हुआ ऐसी शोभा देता है, मानो काजलके पर्वतसे गेरूके पनाले बह रहे हों। उसे व्याकुल देखकर रीछ-वानर दौड़े। वे ज्यों ही निकट आये, त्यों ही वह हँसा ॥ ४ ॥
दो०—महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस।
महि पटकड़ गजराज इव सपथ करड़ दससीस ॥ ६९ ॥
और बड़ा घोर शब्द करके गरजा। तथा करोड़-करोड़ वानरोंको पकड़कर वह गजराजकी तरह उन्हें पृथ्वीपर पटकने लगा और रावणकी दुहाई देने लगा ॥ ६९ ॥
भागे भालु बलीमुख जूथा । बूकु बिलोकि जिमि मेघ बरूथा ॥ चले भागि कपि भालु भवानी । बिकल पुकारत आरत बानी ॥
यह देखकर रीछ-वानरोंके झुंड ऐसे भागे जैसे भेंड़ियेको देखकर भेंड़ोंके झुंड। [शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! वानर-भालू व्याकुल होकर आर्तवाणीसे पुकारते हुए भाग चले ॥ १ ॥
यह निसिचर दुकाल सम अहई । कपिकुल देस परन अब चहई ॥ कृपा बारिधर राम खरारी । पाहि पाहि प्रनतारति हारी ॥