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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 843, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 843
  • लङ्काकाण्ड *

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अतुलनीय बलवाले कोसलपति श्रीरघुनाथजी रणभूमिमें सुशोभित हैं। मुखपर पसीनेकी बूँदें हैं, कमलके समान नेत्र कुछ लाल हो रहे हैं। शरीरपर रक्तके कण हैं, दोनों हाथोंसे धनुष-बाण फिरा रहे हैं। चारों ओर रीछ-वानर सुशोभित हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभुकी इस छबिका वर्णन शेषजी भी नहीं कर सकते जिनके बहुत-से (हजार) मुख हैं।

दो०— निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम।

गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम ॥ ७१ ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे गिरिजे! कुम्भकर्ण, जो नीच राक्षस और पापकी खान था, उसे भी श्रीरामजीने अपना परमधाम दे दिया! अतः वे मनुष्य [निश्चय ही] मन्दबुद्धि हैं जो उन श्रीरामजीको नहीं भजते ॥ ७१ ॥

दिन के अंत फिरीं द्वौ अनी । समर भई सुभटन्ह श्रम घनी ॥ राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा । जिमि तून पाइ लाग अति डाढ़ा ॥

दिनका अन्त होनेपर दोनों सेनाएँ लौट पड़ीं। [आजके युद्धमें] योद्धाओंको बड़ी थकावट हुई; परन्तु श्रीरामजीकी कृपासे वानरसेनाका बल उसी प्रकार बढ़ गया जैसे घास पाकर अग्नि बहुत बढ़ जाती है ॥ १ ॥

छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती । निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती ॥ बहु बिलाप दसकंधर करई । बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई ॥

उधर राक्षस दिन-रात इस प्रकार घटते जा रहे हैं जिस प्रकार अपने ही मुखसे कहनेपर पुण्य घट जाते हैं। रावण बहुत विलाप कर रहा है। बार-बार भाई (कुम्भकर्ण) का सिर कलेजेसे लगाता है ॥ २ ॥

रोवहिं नारि हृदय हति पानी । तासु तेज बल बिपुल बखानी ॥ मेघनाद तेहि अवसर आयउ । कहि बहु कथा पिता समुझायउ ॥

स्त्रियाँ उसके बड़े भारी तेज और बलको बखान करके हाथोंसे छाती पीट-पीटकर रो रही हैं। उसी समय मेघनाद आया और उसने बहुत-सी कथाएँ कहकर पिताको समझाया ॥ ३ ॥

देखेहु कालि मोरि मनुसाई । अबहिं बहुत का करौं बड़ाई ॥ इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ । सो बल तात न तोहि देखायउँ ॥

[और कहा—] कल मेरा पुरुषार्थ देखियेगा। अभी बहुत बड़ाई क्या करूँ? हे तात! मैंने अपने इष्टदेवसे जो बल और रथ पाया था वह बल [और रथ] अबतक आपको नहीं दिखलाया था ॥ ४ ॥

एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना । चहुँ दुआर लागे कपि नाना ॥ इत कपि भालु काल सम बीरा । उत रजनीचर अति रनधीरा ॥