श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 855, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
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धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं । प्रह्लादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं ॥ धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही । जय राम जो तून ते कुलिस कर कुलिस ते कर तून सही ॥
वे राक्षसोंके गाल पकड़कर फाड़ डालते हैं, छाती चीर डालते हैं और उनकी अँतड़ियाँ निकालकर गलेमें डाल लेते हैं। वे वानर ऐसे देख पड़ते हैं मानो प्रह्लादके स्वामी श्रीनृसिंहभगवान् अनेकों शरीर धारण करके युद्धके मैदानमें क्रीड़ा कर रहे हों। पकड़ो, मारो, काटो, पछाड़ो आदि घोर शब्द आकाश और पृथ्वीमें भर (छा) गये हैं। श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, जो सचमुच तृणसे वज्र और वज्रसे तृण कर देते हैं (निर्बलको सबल और सबलको निर्बल कर देते हैं) ॥ २ ॥
दो०— निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप।
रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप ॥ ८१ ॥
अपनी सेनाको विचलित होते हुए देखा, तब बीस भुजाओंमें दस धनुष लेकर रावण रथपर चढ़कर गर्व करके 'लौटो', 'लौटो' कहता हुआ चला ॥ ८१ ॥
धायउ परम कृच्छ्र दसकंधर। सन्मुख चले हूह दै बंदर ॥ गहि कर पादप उपल पहारा। डारेन्हि ता पर एकहिं बारा ॥
रावण अत्यन्त क्रोधित होकर दौड़ा। वानर हुंकार करते हुए [लड़नेके लिये] उसके सामने चले। उन्होंने हाथोंमें वृक्ष, पत्थर और पहाड़ लेकर रावणपर एक ही साथ डाले ॥ १ ॥
लागहिं सैल बज्र तन तासू। खंड खंड होइ फूटहिं आसू ॥ चला न अचल रहा रथ रोपी। रन दुर्मद रावन अति कोपी ॥
पर्वत उसके वज्रतुल्य शरीरमें लगते ही तुरंत टुकड़े-टुकड़े होकर फूट जाते हैं। अत्यन्त क्रोधी रणोन्मत्त रावण रथ रोककर अचल खड़ा रहा, [अपने स्थानसे] जरा भी नहीं हिला ॥ २ ॥
इत उत झपटि दपटि कपि जोधा। मदैं लाग भयउ अति क्रोधा ॥ चले पराइ भालु कपि नाना। त्राहि त्राहि अंगद हनुमाना ॥
उसे बहुत ही क्रोध हुआ। वह इधर-उधर झपटकर और डपटकर वानर योद्धाओंको मसलने लगा। अनेकों वानर-भालू 'हे अंगद! हे हनुमान्! रक्षा करो, रक्षा करो' [पुकारते हुए] भाग चले ॥ ३ ॥
पाहि पाहि रघुबीर गोसाई। यह खल खाड़ काल की नाई ॥ तेहिं देखे कपि सकल पराने। दसहुँ चाप सायक संधाने ॥