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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 881, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 881
  • लङ्काकाण्ड *

८७९

नाभिकुंड पियूष बस याकें । नाथ जितत रावनु बल ताकें ॥ सुनत बिभीषन बचन कृपाला । हरषि गहे कर बान कराला ॥

इसके नाभिकुण्डमें अमृतका निवास है। हे नाथ! रावण उसीके बलपर जीता है। विभीषणके वचन सुनते ही कृपालु श्रीरघुनाथजीने हर्षित होकर हाथमें विकराल बाण लिये ॥ ३ ॥

असुभ होन लागे तब नाना । रोवहिं खर सूकाल बहु स्वाना ॥ बोलहिं खग जग आरति हेतू । प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू ॥

उस समय नाना प्रकारके अशकुन होने लगे। बहुत-से गदहे, स्यार और कुत्ते रोने लगे। जगत्के दुःख (असुभ) को सूचित करनेके लिये पक्षी बोलने लगे। आकाशमें जहाँ-तहाँ केतु (पुच्छल तारे) प्रकट हो गये ॥ ४ ॥

दस दिसि दाह होन अति लागा । भयउ परब बिनु रबि उपरागा ॥ मन्दोदरि उर कंपति भारी । प्रतिमा स्वर्वाहिं नयन मग बारी ॥

दसों दिशाओंमें अत्यन्त दाह होने लगा (आग लगने लगी)। बिना ही पर्व (योग) के सूर्यग्रहण होने लगा। मन्दोदरीका हृदय बहुत काँपने लगा। मूर्तियाँ नेत्र-मार्गसे जल बहाने लगीं ॥ ५ ॥

छं०—प्रतिमा रुदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही । बरषहिं बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही ॥ उतपात अमित बिलोकि नभ सुरबिकल बोलहिं जय जए । सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए ॥

मूर्तियाँ रोने लगीं, आकाशसे वज्रपात होने लगे, अत्यन्त प्रचण्ड वायु बहने लगी, पृथ्वी हिलने लगी, बादल रक्त, बाल और धूलकी वर्षा करने लगे। इस प्रकार इतने अधिक अमङ्गल होने लगे कि उनको कौन कह सकता है? अपरिमित उत्पात देखकर आकाशमें देवता व्याकुल होकर जय-जय पुकार उठे। देवताओंको भयभीत जानकर कृपालु श्रीरघुनाथजी धनुषपर बाण सन्धान करने लगे।

दो०—खैँचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस । रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस ॥ १०२ ॥

कानोंतक धनुषको खींचकर श्रीरघुनाथजीने इकतीस बाण छोड़े। वे श्रीरामचन्द्रजीके बाण ऐसे चले मानो कालसर्प हों ॥ १०२ ॥

सायक एक नाभि सर सोषा । अपर लगे भुज सिर करि रोषा ॥ तै सिर बाहु चले नाराचा । सिर भुज हीन रुंड महि नाचा ॥