श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 935, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरकाण्ड *
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बेलें और वृक्ष माँगनेसे ही मधु (मकरन्द) टपका देते हैं। गौएँ मनचाहा दूध देती हैं। धरती सदा खेतीसे भरी रहती है। त्रेतामें सत्ययुगकी करनी (स्थिति) हो गयी॥ ३ ॥
प्रगटों गिरिन्ह बिबिधि मनि खानी । जगदातमा भूप जग जानी॥ सरिता सकल बहहिं बर बारी । सीतल अमल स्वाद सुखकारी॥
समस्त जगत्के आत्मा भगवान्को जगत्का राजा जानकर पर्वतोंने अनेक प्रकारकी मणियोंकी खानें प्रकट कर दीं। सब नदियाँ श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल और सुखप्रद स्वादिष्ट जल बहने लगीं॥ ४ ॥
सागर निज मरजादाँ रहहीं । डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं॥ सरसिज संकुल सकल तड़ागा । अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा॥
समुद्र अपनी मर्यादामें रहते हैं। वे लहरोंके द्वारा किनारोंपर रत्न डाल देते हैं, जिन्हें मनुष्य पा जाते हैं। सब तालाब कमलोंसे परिपूर्ण हैं। दसों दिशाओंके विभाग (अर्थात् सभी प्रदेश) अत्यन्त प्रसन्न हैं॥ ५ ॥
दो०—बिधु महि पूर मयूरखन्हि रबि तप जेतनेहि काज । मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज॥ २३ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें चन्द्रमा अपनी [अमृतमयी] किरणोंसे पृथ्वीको पूर्ण कर देते हैं। सूर्य उतना ही तपते हैं जितनेकी आवश्यकता होती है और मेघ माँगनेसे [जब जहाँ जितना चाहिये उतना ही] जल देते हैं॥ २३ ॥
कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे । दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे॥ श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर । गुनातीत अरु भोग पुरंदर॥
प्रभु श्रीरामजीने करोड़ों अश्वमेध यज्ञ किये और ब्राह्मणोंको अनेकों दान दिये। श्रीरामचन्द्रजी वेदमार्गके पालनेवाले, धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले, [प्रकृतितज्ज् सत्त्व, रज और तम] तीनों गुणोंसे अतीत और भोगों (ऐश्वर्य) में इन्द्रके समान हैं॥ १ ॥
पति अनुकूल सदा रह सीता । सोभा खानि सुसील बिनीता॥ जानति कृपासिंधु प्रभुताई । सेवति चरन कमल मन लाई॥
शोभाकी खान, सुशील और विनम्र सीताजी सदा पतिके अनुकूल रहती हैं। वे कृपासागर श्रीरामजीकी प्रभुता (महिमा) को जानती हैं और मन लगाकर उनके चरणकमलोंकी सेवा करती हैं॥ २ ॥
जद्यपि गृहं सेवक सेवकिनी । बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी॥ निज कर गृह परिचरजा करई । रामचंद्र आयसु अनुसरई॥