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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 939, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 939
  • उत्तरकाण्ड *

१३७

दो०—चारु चित्रशाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ।

राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ ॥ २७ ॥

घर-घरमें सुन्दर चित्रशालाएँ हैं, जिनमें श्रीरामजीके चरित्र बड़ी सुन्दरताके साथ सँवारकर अङ्कित किये हुए हैं। जिन्हें मुनि देखते हैं, तो वे उनके भी चित्तको चुरा लेते हैं ॥ २७ ॥

सुमन बाटिका सबहिं लगाई। बिबिध भाँति करि जतन बनाई ॥

लता ललित बहु जाति सुहाई। फूलहिं सदा बसंत कि नाई ॥

सभी लोगोंने भिन्न-भिन्न प्रकारकी पुष्पोंकी वाटिकाएँ यत्न करके लगा रखी हैं, जिनमें बहुत जातियोंकी सुन्दर और ललित लताएँ सदा बसंतकी तरह फूलती रहती हैं ॥ १ ॥

गुंजत मधुकर मुखर मनोहर। मारुत त्रिबिधि सदा बह सुंदर ॥

नाना खग बालकन्हि जिआए। बोलत मधुर उड़ात सुहाए ॥

भौर मनोहर स्वरसे गुंजार करते हैं। सदा तीनों प्रकारकी सुन्दर वायु बहती रहती है। बालकोंने बहुत-से पक्षी पाल रखे हैं, जो मधुर बोली बोलते हैं और उड़नेमें सुन्दर लगते हैं ॥ २ ॥

मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर सोभा अति पावत ॥

जहाँ तहाँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं ॥

मोर, हंस, सारस और कबूतर घरोंके ऊपर बड़ी ही शोभा पाते हैं। वे पक्षी [मणियोंकी दीवारोंमें और छतमें] जहाँ-तहाँ अपनी परछाई देखकर [वहाँ दूसरे पक्षी समझकर] बहुत प्रकारसे मधुर बोली बोलते और नृत्य करते हैं ॥ ३ ॥

सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहहु राम रघुपति जनपालक ॥

राज दुआर सकल बिधि चारु। बीथीं चौहट रुचिर बजारु ॥

बालक तोता-मैनाको पढ़ाते हैं कि कहो—‘राम’ ‘रघुपति’ ‘जनपालक’। राजद्वार सब प्रकारसे सुन्दर है। गलियाँ, चौराहे और बाजार सभी सुन्दर हैं ॥ ४ ॥

छं०—बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए।

जहाँ भूप रमानिवास तहाँ की संपदा किमि गाइए ॥

बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते।

सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिमु जरठ जे ॥

सुन्दर बाजार है, जो वर्णन करते नहीं बनता; वहाँ वस्तुएँ बिना ही मूल्य मिलती हैं। जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति राजा हों, वहाँकी सम्पत्तिका वर्णन कैसे किया जाय? बजाज (कपड़ेका व्यापार करनेवाले), सराफ (रुपये-पैसेका लेन-देन करनेवाले) आदि वणिक् (व्यापारी) बैठे हुए ऐसे जान पड़ते हैं मानो अनेक कुबेर हों। स्त्री, पुरुष, बच्चे और बूढ़े जो भी हैं, सभी सुखी, सदाचारी और सुन्दर हैं।