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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 951, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 951
  • उत्तरकाण्ड *

१४१

कालरूप तिन्ह कहैं मैं भ्राता । सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता ॥ अस बिचारि जे परम सयाने । भजहिं मोहि संसृत दुख जाने ॥

हे भाई! मैं उनके लिये कालरूप (भयंकर) हूँ और उनके अच्छे और बुरे कर्मोंका [यथायोग्य] फल देनेवाला हूँ! ऐसा विचारकर जो लोग परम चतुर हैं वे संसार [के प्रवाह] को दुःखरूप जानकर मुझे ही भजते हैं ॥ ३ ॥

त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक । भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक ॥ संत असंतन्ह के गुन भाषे । ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे ॥

इसीसे वे शुभ और अशुभ फल देनेवाले कर्मोंको त्याग कर देवता, मनुष्य और मुनियोंके नायक मुझको भजते हैं। [इस प्रकार] मैंने संतों और असंतोंके गुण कहे। जिन लोगोंने इन गुणोंको समझ रखा है, वे जन्म-मरणके चक्करमें नहीं पड़ते ॥ ४ ॥

दो०— सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक ।

गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक ॥ ४१ ॥

हे तात! सुनो, मायासे रचे हुए ही अनेक (सब) गुण और दोष हैं (इनकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है)। गुण (विवेक) इसीमें है कि दोनों ही न देखे जायँ, इन्हें देखना ही अविवेक है ॥ ४१ ॥

श्रीमुख बचन सुनत सब भाई । हरषे प्रेम न हृदयँ समाई ॥ करहिं बिनय अति बारहिं बारा । हनुमान हियँ हरष अपारा ॥

भगवान्के श्रीमुखसे ये वचन सुनकर सब भाई हर्षित हो गये। प्रेम उनके हृदयोंमें समाता नहीं। वे बार-बार बड़ी विनती करते हैं। विशेषकर हनुमान्जीके हृदयमें अपार हर्ष है ॥ १ ॥

पुनि रघुपति निज मंदिर गए । एहि बिधि चरित करत नित नए ॥ बार बार नारद मुनि आवहिं । चरित पुनीत राम के गावहिं ॥

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी अपने महलको गये। इस प्रकार वे नित्य नयी लीला करते हैं। नारद मुनि अयोध्यामें बार-बार आते हैं और आकर श्रीरामजीके पवित्र चरित्र गाते हैं ॥ २ ॥

नित नव चरित देखि मुनि जाहीं । ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं ॥ सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं । पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं ॥

मुनि यहाँसे नित्य नये-नये चरित्र देखकर जाते हैं और ब्रह्मलोकमें जाकर सब कथा कहते हैं। ब्रह्माजी सुनकर अत्यन्त सुख मानते हैं [और कहते हैं—] हे तात! बार-बार श्रीरामजीके गुणोंका गान करो ॥ ३ ॥

सनकादिक नारदहि सराहिं । जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहिं ॥ सुनि गुन गान समाधि बिसारी । सादर सुनहिं परम अधिकारी ॥