श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 955, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरकाण्ड *
१५३
मोर दास कहाइ नर आसा । करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा ॥ बहुत कहउँ का कथा बढाई । एहि आचरण बस्य मैं भाई ॥
मेरा दास कहलाकर यदि कोई मनुष्योंकी आशा करता है, तो तुम्हीं कहो, उसका क्या विश्वास है ? (अर्थात् उसकी मुझपर आस्था बहुत ही निर्बल है ।) बहुत बात बढ़ाकर क्या कहूँ ? हे भाइयो ! मैं तो इसी आचरणके वशमें हूँ ॥ २ ॥
बैर न बिग्रह आस न त्रासा । सुखमय ताहि सदा सब आसा ॥ अनारंभ अनिकेत अमानी । अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी ॥
न किसीसे वैर करे, न लड़ाई-झगडा करे, न आशा रखे, न भय ही करे । उसके लिये सभी दिशाएँ सदा सुखमयी हैं । जो कोई भी आरम्भ (फलकी इच्छासे कर्म) नहीं करता, जिसका कोई अपना घर नहीं है (जिसकी घरमें ममता नहीं है), जो मानहीन, पापहीन और क्रोधहीन है, जो [भक्ति करनेमें] निपुण और विज्ञानवान् है ॥ ३ ॥
प्रीति सदा सज्जन संसर्गा । तून सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा ॥ भगति पच्छ हठ नहिं सठताई । दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई ॥
संतजनोंके संसर्ग (सत्संग) से जिसे सदा प्रेम है, जिसके मनमें सब विषय यहाँतक कि स्वर्ग और मुक्तितक [भक्तिके सामने] तृणके समान हैं, जो भक्तिके पक्षमें हठ करता है, पर [दूसरेके मतका खण्डन करनेकी] मूर्खता नहीं करता तथा जिसने सब कुतर्कोंको दूर बहा दिया है, ॥ ४ ॥
दो०—मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह । ता कर सुख सोइ जानइ परानंद संदोह ॥ ४६ ॥
जो मेरे गुणसमूहोंके और मेरे नामके परायण है, एवं ममता, मद और मोहसे रहित है, उसका सुख वही जानता है, जो [परमात्मरूप] परमानन्दराशिको प्राप्त है ॥ ४६ ॥
सुनत सुधासम बचन राम के । गहे सबनि पद कृपाधाम के ॥ जननि जनक गुर बंधु हमारे । कृपा निधान प्रान ते प्यारे ॥
श्रीरामचन्द्रजीके अमृतके समान बचन सुनकर सबने कृपाधामके चरण पकड़ लिये [और कहा—] हे कृपानिधान ! आप हमारे माता, पिता, गुरु, भाई सब कुछ हैं और प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं ॥ १ ॥
तनु धनु धाम राम हितकारी । सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी ॥ असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ । मातु पिता स्वारथ रत ओऊ ॥