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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 984, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 984

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  • रामचरितमानस *

ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा । मितइ न जीवन्ह केर कलेसा ॥ हरि सेवकहि न व्याप अबिद्या । प्रभु प्रेरित व्यापइ तेहि बिद्या ॥

हे पक्षिराज ! इसी प्रकार श्रीहरिके भजन बिना जीवोंका क्लेश नहीं मितता । श्रीहरिके सेवकको अबिद्या नहीं व्यापती । प्रभुकी प्रेरणासे उसे विद्या व्यापती है ॥ १ ॥

ताते नास न होइ दास कर । भेद भगति बाढ़इ बिहंगबर ॥ भ्रम तें चकित राम मोहि देखा । बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा ॥

हे पक्षिश्रेष्ठ ! इसीसे दासका नाश नहीं होता और भेद-भक्ति बढ़ती है । श्रीरामजीने मुझे जब भ्रमसे चकित देखा, तब वे हँसे । वह विशेष चरित्र सुनिये ॥ २ ॥

तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ । जाना अनुज न मातु पिताहूँ ॥ जानु पानि धाए मोहि धरना । स्यामल गात अरुन कर चरना ॥

उस खेलका मर्म किसीने नहीं जाना, न छोटे भाइयोंने और न माता-पिताने ही । वे श्याम शरीर और लाल-लाल हथेली और चरणतलवाले बालरूप श्रीरामजी घुटने और हाथोंके बल मुझे पकड़नेको दौड़े ॥ ३ ॥

तब मैं भागि चलेउँ उरगारी । राम गहन कहँ भुजा पसारी ॥ जिमि जिमि दूर उड़ाउँ अकासा । तहँ भुज हरि देखउँ निज पास ॥

हे सपोंके शत्रु गरुड़जी ! तब मैं भाग चला । श्रीरामजीने मुझे पकड़नेके लिये भुजा फैलायी । मैं जैसे-जैसे आकाशमें दूर उड़ता, वैसे-वैसे ही वहाँ श्रीहरिकी भुजाको अपने पास देखता था ॥ ४ ॥

दो०— ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं चितयउँ पाछ उड़ात ।

जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात ॥ ७९ ( क ) ॥

मैं ब्रह्मलोकतक गया और जब उड़ते हुए मैंने पीछेकी ओर देखा, तो हे तात ! श्रीरामजीकी भुजामें और मुझमें केवल दो ही अंगुलका बीच था ॥ ७९ ( क ) ॥

ससाबरन भेद करि जहाँ लगे गति मोरि ।

गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि व्याकुल भयउँ बहोरि ॥ ७९ ( ख ) ॥

सातों आवरणोंको भेदकर जहाँतक मेरी गति थी, वहाँतक मैं गया । पर वहाँ भी प्रभुकी भुजाको [अपने पीछे] देखकर मैं व्याकुल हो गया ॥ ७९ ( ख ) ॥

मूदेउँ नयन त्रसित जब भयऊँ । पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ ॥ मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं । बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं ॥