श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 99, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- बालकाण्ड *
१७
जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए । करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए ॥ बहरि ससरिषि सिव पहिं जाई । कथा उमा कै सकल सुनाई ॥
मुनियोंने जाकर हिमवान्को पार्वतीजीके पास भेजा और वे विनती करके उनको घर ले आये; फिर ससरियोंने शिवजीके पास जाकर उनको पार्वतीजीकी सारी कथा सुनायी ॥ १ ॥
भए मगन सिव सुनत सनेहा । हरषि सप्तरिषि गवने गेहा ॥ मनु थिर करि तब संभु सुजाना । लगे करन रघुनायक ध्याना ॥
पार्वतीजीका प्रेम सुनते ही शिवजी आनन्दमग्न हो गये। ससरि प्रसन्न होकर अपने घर (ब्रह्मलोक)को चले गये। तब सुजान शिवजी मनको स्थिर करके श्रीरघुनाथजीका ध्यान करने लगे ॥ २ ॥
तारकु असुर भयउ तेहि काला । भुज प्रताप बल तेज बिसाला ॥ तेहिं सब लोक लोकपति जीते । भए देव सुख संपति रीते ॥
उसी समय तारक नामका असुर हुआ, जिसकी भुजाओंका बल, प्रताप और तेज बहुत बड़ा था। उसने सब लोक और लोकपालोंको जीत लिया, सब देवता सुख और सम्पत्तिसे रहित हो गये ॥ ३ ॥
अजर अमर सो जीति न जाई । हारे सुर करि बिबिध लराई ॥ तब बिरंचि सन जाइ पुकारे । देखे बिधि सब देव दुखारे ॥
वह अजर-अमर था, इसलिये किसीसे जीता नहीं जाता था। देवता उसके साथ बहुत तरहकी लड़ाइयाँ लड़कर हार गये। तब उन्होंने ब्रह्माजीके पास जाकर पुकार मचायी। ब्रह्माजीने सब देवताओंको दुःखी देखा ॥ ४ ॥
दो०—सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ। संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ ॥ ८२ ॥
ब्रह्माजीने सबको समझाकर कहा—इस दैत्यकी मृत्यु तब होगी जब शिवजीके वीर्यसे पुत्र उत्पन्न हो, इसको युद्धमें वही जीतेगा ॥ ८२ ॥
मोर कहा सुनि करहु उपाई । होइहि ईस्वर करिहि सहाई ॥ सतीं जो तजी दच्छ मख देहा । जनमी जाइ हिमाचल गेहा ॥
मेरी बात सुनकर उपाय करो। ईश्वर सहायता करेंगे और काम हो जायगा। सतीजीने जो दक्षके यज्ञमें देहका त्याग किया था, उन्होंने अब हिमाचलके घर जाकर जन्म लिया है ॥ १ ॥
तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी । सिव समाधि बैठे सबु त्यागी ॥ जदपि अहइ असमंजस भारी । तदपि बात एक सुनहु हमारी ॥