श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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विषयकी कल्पना विवेकी पुरुषोंकी बुद्धिने की है; वह अल्पबुद्धिवाले पुरुषोंकी समझमें सुगमतासे नहीं आ सकता। अतः मेरी प्रार्थना है कि इस दुर्बोध विषयको रूपकका स्पष्टीकरण करनेवाले शब्दोंसे खोलकर समझाइये ॥२६॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥
१. प्रा० पा०—तत्रातिकृच्छ्रं प्रति। २. प्रा० पा०—अन्योन्यकर्म। १. प्रा० पा०—सुनिर्जितेन्द्रियः। २. प्रा० पा०—मुष्मिन्नंजसा। १. प्रा० पा०—आत्मस्वतत्त्वं। २. प्रा० पा०—चरणः पूर्णार्णव इव। ३. प्रा० पा०—मिमां चचार। ४. प्रा० पा०—भगवदाश्रितानुभावः।