भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1023

दृष्टिमें मोक्षपद भी अत्यन्त तुच्छ है ॥४४॥ उन्होंने मृगशरीर छोड़नेकी इच्छा होनेपर उच्चस्वरसे कहा था कि धर्मकी रक्षा करनेवाले, धर्मानुष्ठानमें निपुण, योगगम्य, सांख्यके प्रतिपाद्य, प्रकृतिके अधीश्वर यज्ञमूर्ति सर्वान्तर्यामी श्रीहरिको नमस्कार है।' ॥४५॥ राजन्! राजर्षि भरतके पवित्र गुण और कर्मोंकी भक्तजन भी प्रशंसा करते हैं। उनका यह चरित्र बड़ा कल्याणकारी, आयु और धनकी वृद्धि करनेवाला, लोकमें सुयश बढ़ानेवाला और अन्तमें स्वर्ग तथा मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला है। जो पुरुष इसे सुनता या सुनाता है और इसका अभिनन्दन करता है, उसकी सारी कामनाएँ स्वयं ही पूर्ण हो जाती हैं; दूसरोंसे उसे कुछ भी नहीं माँगना पड़ता ॥४६॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भरतोपाख्याने परोक्ष्यविवरणं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥


१. प्रा० पा०—पोपशमनां।
१. प्रा० पा०—यत्किंचित्साक्षाद्धर्मौप। २. प्रा० पा०—यत् परमपुरुषा०। ३. प्रा० पा०—दर्शनस्वादनावघ्राणसङ्कल्प-संव्यवसाय०। ४. प्रा० पा०—यथा सार्थिकस्य त०। ५. प्रा० पा०—निमिषतो०। ६. प्रा० पा०—रतो दंशमशकापसदै०।
१. प्रा० पा०—परुषसंरभसाटोपं प्रत्यक्षं वा रिपुराज०।
१. प्रा० पा०—मतिर्विदिक्स्रोतःस्वनेन स्खलन०। २. प्रा० पा०—मृत इव। ३. प्रा० पा०—गृहीतगतसारः।