श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउस नदीके दोनों किनारोंकी मिट्टी उस रससे भीगकर जब वायु और सूर्यके संयोगसे सूख जाती है, तब वही देवलोकको विभूषित करनेवाला जाम्बूनद नामका सोना बन जाती है ।।२०।। इसे देवता और गन्धर्वादि अपनी तरुणी स्त्रियोंके सहित मुकुट, कंकण और करधनी आदि आभूषणोंके रूपमें धारण करते हैं ।।२१।।
सुपार्श्व पर्वतपर जो विशाल कदम्बवृक्ष है, उसके पाँच कोटरोंसे मधुकी पाँच धाराएँ निकलती हैं; उनकी मोटाई पाँच पुरसे जितनी है। ये सुपार्श्वके शिखरसे गिरकर इलावृतवर्षके पश्चिमी भागको अपनी सुगन्धसे सुवासित करती हैं ।।२२।। जो लोग इनका मधुपान करते हैं, उनके मुखसे निकली हुई वायु अपने चारों ओर सौ-सौ योजनतक इसकी महक फैला देती है ।।२३।।
एवं कुमुदनिरूढो यः शतवल्शो नाम वटस्तस्य स्कन्धेभ्यो नीचीनाः पयोदधिमधुघृत-गुड़ान्नाद्यम्बरशय्यासनाभरणादयः सर्व एव कामदुघा नदाः कुमुदाग्रात्पतन्तस्तमुत्तरे-णेलावृतमुपयोजयन्ति ।।२४।। यानुपजुषाणां न कदाचिदपि प्रजानां वलीपलितक्लमस्वेद-दौर्गन्ध्यजरामृत्युशीतोष्णवैवर्ण्योपसर्गादय-स्तापविशेषा भवन्ति यावज्जीवं सुखं निरतिशयमेव ।।२५।।
कुरङ्गकुररकुसुम्भवैकङ्कत्रिकूटशिशिर-पतङ्गरुचकनिषधशिनीवासकपिलशङ्खवैदूर्य-जारुधिहंसर्षभनागकालञ्जरनारदादयो विंशति-गिरयो मेरोः कर्णिकाया इव केसरभूता मूलदेशे परित उपकॢप्ताः ।।२६।। जठरदेवकूटौ मेरुं पूर्वेणाष्टादशयोजनसहस्रमुद्गायतौ द्विसहस्रं पृथुतुङ्गौ भवतः । एवमपरेण पवनपारियात्रौ दक्षिणेन कैलासकरवीरौ प्रागायतावेवमुत्तरतस्त्रिशृङ्गमकरावष्टभिरेतैः परिस्तृतोऽग्निरिव परितश्चकास्ति काञ्चनगिरिः ।।२७।। मेरोर्मूर्धनि भगवत आत्म-योनेर्मध्यत उपकॢप्तां पुरीमयुतयोजनसाहस्रीं समचतुरस्रां शातकौम्भीं वदन्ति ।।२८।। तामनु परितो लोकपालानामहष्टानां यथादिशं यथारूपं तुरीयमानेने पुरोऽष्टावुपकॢप्ताः ।।२९।।
इसी प्रकार कुमुद पर्वतपर जो शतवल्श नामका वटवृक्ष है, उसकी जटाओंसे नीचेकी ओर बहनेवाले अनेक नद निकलते हैं, वे सब इच्छानुसार भोग देनेवाले हैं। उनसे दूध, दही, मधु, घृत, गुड़, अन्न, वस्त्र, शय्या, आसन और आभूषण आदि सभी पदार्थ मिल सकते हैं। ये सब कुमुदके शिखरसे गिरकर इलावृतके उत्तरी भागको सींचते हैं ।।२४।। इनके दिये हुए पदार्थोंका उपभोग करनेसे वहाँकी प्रजाकी त्वचा में झुर्रियाँ पड़ जाना, बाल पक जाना, थकान होना, शरीरमें पसीना आना तथा दुर्गन्ध निकलना, बुढ़ापा, रोग, मृत्यु, सर्दी-गरमीकी पीड़ा, शरीरका कान्तिहीन हो जाना तथा अंगोंका टूटना आदि कष्ट कभी नहीं सताते और उन्हें जीवनपर्यन्त पूरा-पूरा सुख प्राप्त होता है ।।२५।।
राजन्! कमलकी कर्णिकाके चारों ओर जैसे केसर होता है—उसी प्रकार मेरुके मूलदेशमें उसके चारों ओर कुरंग, कुरर, कुसुमभ, वैकंक, त्रिकूट, शिशिर, पतंग, रुचक,