भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1064

मृतेऽण्ड एष एतस्मिन् यदभूत्ततो मार्तण्ड इति व्यपदेशः । हिरण्यगर्भ इति यद्धिरण्याण्डसमुद्भवः ॥४४

सूर्येण हि विभज्यन्ते दिशः खं द्यौर्मही भिदा । स्वर्गापवर्गौ नरका रसौकांसि च सर्वशः ॥४५

देवतियर्ङ्मनुष्याणां सरीसृपसवीरुधाम् । सर्वजीवनिकायानां सूर्य आत्मा दृगीश्वरः ॥४६

इस प्रकार अपनी योगमायासे रचे हुए विविध लोकोंकी व्यवस्थाको सुरक्षित रखनेके लिये वे इसी लीलामयरूपसे कल्पके अन्ततक वहाँ सब ओर रहते हैं ॥४१॥ लोकालोकके अन्तर्वर्ती भूभागका जितना विस्तार है, उसीसे उसके दूसरी ओरके अलोक प्रदेशके परिमाणकी भी व्याख्या समझ लेनी चाहिये। उसके आगे तो केवल योगेश्वरोंकी ही ठीक-ठीक गति हो सकती है ॥४२॥

राजन्! स्वर्ग और पृथ्वीके बीचमें जो ब्रह्माण्डका केन्द्र है, वही सूर्यकी स्थिति है। सूर्य और ब्रह्माण्डगोलकके बीचमें सब ओरसे पच्चीस करोड़ योजनका अन्तर है ॥४३॥ सूर्य इस मृत अर्थात् मरे हुए (अचेतन) अण्डमें वैराजरूपसे विराजते हैं, इसीसे इनका नाम ‘मार्त्तण्ड’ हुआ है। ये ‘हिरण्मय (ज्योतिर्मय) ब्रह्माण्डसे प्रकट हुए हैं, इसलिये इन्हें हिरण्यगर्भ’ भी कहते हैं ॥४४॥ सूर्यके द्वारा ही दिशा, आकाश, द्युलोक (अन्तरिक्षलोक), भूर्लोक, स्वर्ग और मोक्षके प्रदेश, नरक और रसातल तथा अन्य समस्त भागोंका विभाग होता है ॥४५॥ सूर्य ही देवता, तिर्यक्, मनुष्य, सरीसृप और लता-वृक्षादि समस्त जीवसमूहोंके आत्मा और नेत्रेन्द्रियके अधिष्ठाता हैं ॥४६॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भुवनकोशवर्णने समुद्रवर्षसंनिवेशपरिमाणलक्षणो विंशोऽध्यायः ॥२०॥


१. प्रा० पा०—ख्यायनो ज्वलन। २. प्रा० पा०—विराजति। १. प्रा० पा०—चिराभिगुप्त०। २. प्रा० पा०—ज्ञाताः सप्त्तैव चक्र०। ३. प्रा० पा०—पिलो वित्रकूटो। ४. प्रा० पा०—श्वेतद्वीपे। १. प्रा० पा०—दकसमुद्रेण। २. प्रा० पा०—पुष्कर ज्वलन०। ३. प्रा० पा०—सोत्तरो नामैक। ४. प्रा० पा०—प्राचीनयोर्वर्षयो०। ५. प्रा० पा०—चक्रमहोरात्राभ्यां। ६. प्रा० पा०—णकघातकनामानौ। १. प्रा० पा०—भूगोलकस्य। २. प्रा० पा०—भिनिवेशिता। ३. प्रा० पा०—भितैर्भुजदण्डैः।