श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीता मया तव नृपादभुतमीश्वरस्य
स्थूलं वपुः सकलजीवनिकायधाम ॥४०
यतिको चाहिये कि भगवान्के स्थूल और सूक्ष्म दोनों प्रकारके रूपोंका श्रवण करके पहले स्थूलरूपमें चित्तको स्थिर करे, फिर धीरे-धीरे वहाँसे हटाकर उसे सूक्ष्ममें लगा दे ॥३९॥ परीक्षित्! मैंने तुमसे पृथ्वी, उसके अन्तर्गत द्वीप, वर्ष, नदी, पर्वत, आकाश, समुद्र, पाताल, दिशा, नरक, ज्योतिर्गण और लोकोंकी स्थितिका वर्णन किया। यही भगवान्का अति अद्भुत स्थूलरूप है, जो समस्त जीवसमुदायका आश्रय है ॥४०॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्रयां पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे नरकानुवर्णनं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥२६॥
१. प्रा० पा०—कर्तृश्रद्धायाः। २. प्रा० पा०—कर्तृश्रद्धायाः। ३. प्रा० पा०—विद्याकामानां।
१. प्रा० पा०—क्रव्यादा रुरवस्तं। २. प्रा० पा०—मये खले। ३. प्रा० पा०—शेतेऽवतिष्ठति। ४. प्रा० पा०—यस्तू ह वै। ५. प्रा० पा०—पाषण्डानुगमनं।
१. प्रा० पा०—अश्ममयैरग्नि। २. प्रा० पा०—दपि गच्छति। ३. प्रा० पा०—ताडयेत्तिग्मया। ४. प्रा० पा०—पुरुषमूर्त्या। ५. प्रा० पा०—धर्मसेतुं।
* क्षत्रियों एवं वैश्योंके लिये शास्त्रमें सोमपानका निषेध है।
१. प्रा० पा०—यस्त्विहात्मसंभावनेन। २. प्रा० पा०—स्वस्त्रियो नृपशून्। ३. प्रा० पा०—इह। ४. प्रा० पा०—उपश्लिष्य।
॥ इति पञ्चमः स्कन्धः समाप्तः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥