श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्वे च नूतनवयसः सर्वे चारुचतुर्भुजाः । धनुर्निषङ्गासिगदाशङ्खचक्राम्बुजश्रियः ।।३५
दिशो वितिमिरालोकाः कुर्वन्तः स्वेन रोचिषा । किमर्थं धर्मपालस्य किङ्करान्नो निषेधथ ।।३६
श्रीशुक उवाच
इत्युक्ते यमदूतैस्तैर्वासुदेवोक्तकारिणः । तान् प्रत्युचुः प्रहस्येदं मेघनिर्ह्रादया गिरा ।।३७
विष्णुदूता ऊचुः
यूयं वै धर्मराजस्य यदि निर्देशकारिणः । ब्रूत धर्मस्य नस्तत्त्वं यच्च धर्मस्य लक्षणम् ।।३८
कथंस्विद् ध्रियते दण्डः किं वास्य स्थानमीप्सितम् । दण्ड्याः किं कारिणः सर्वेआहोस्वित्कतिचिन्नृणाम् ।।३९
यमदूता ऊचुः
वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः । वेदो नारायणः साक्षात्स्वयम्भूरिति शुश्रुम ।।४०
येन स्वधाम्न्यमी भावा रजःसत्त्वतमोमयाः । गुणनामक्रियारूपैर्विभाव्यन्ते यथातथम् ।।४१
उनके रोकनेपर यमराजके दूतोंने उनसे कहा— 'अरे, धर्मराजकी आज्ञाका निषेध करनेवाले तुमलोग हो कौन? ।।३२।। तुम किसके दूत हो, कहाँसे आये हो और इसे ले जानेसे हमें क्यों रोक रहे हो? क्या तुमलोग कोई देवता, उपदेवता अथवा सिद्धश्रेष्ठ हो? ।।३३।। हम देखते हैं कि तुम सब लोगोंके नेत्र कमलदलके समान कोमलतासे भरे हैं, तुम पीले-पीले रेशमी वस्त्र पहने हो, तुम्हारे सिरपर मुकुट, कानोंमें कुण्डल और गलोंमें कमलके हार लहरा रहे हैं ।।३४।। सबकी नयी अवस्था है, सुन्दर-सुन्दर चार-भुजाएँ हैं, सभीके करकमलोंमें धनुष, तरकश, तलवार, गदा, शंख, चक्र, कमल आदि सुशोभित हैं ।।३५।। तुमलोगोंकी अंगकान्तिसे दिशाओंका अन्धकार और प्राकृत प्रकाश भी दूर हो रहा है। हम धर्मराजके
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