श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनन्द, सुनन्द आदि पार्षद उनके चारों ओर खड़े थे। इन्द्र आदि देवेश्वरगण स्तुति कर रहे थे तथा सिद्ध, गन्धर्व और चारण भगवान्के गुणोंका गान कर रहे थे। यह अत्यन्त आश्चर्यमय और अलौकिक रूप देखकर दक्षप्रजापति कुछ सहम गये ।।३९-४०।। प्रजापति दक्षने आनन्दसे भरकर भगवान्के चरणोंमें साष्टांग प्रणाम किया। जैसे झरनोंके जलसे नदियाँ भर जाती हैं, वैसे ही परमानन्दके उद्रेकसे उनकी एक-एक इन्द्रिय भर गयी और आनन्दपरवश हो जानेके कारण वे कुछ भी बोल न सके ।।४१।। परीक्षित्! प्रजापति दक्ष अत्यन्त नम्रतासे झुककर भगवान्के सामने खड़े हो गये। भगवान् सबके हृदयकी बात जानते ही हैं, उन्होंने दक्ष प्रजापतिकी भक्ति और प्रजावृद्धिकी कामना देखकर उनसे यों कहा ।।४२।।
श्रीभगवानुवाच
प्राचेतस महाभाग संसिद्धस्तपसा भवान् । यच्छ्रद्धया मत्परया मयि भावं परं गतः ।।४३
प्रीतोऽहं ते प्रजानाथ यत्तेऽस्योद्बृंहणं तपः । ममैष कामो भूतानां यद् भूयासुर्विभूतयः ।।४४
ब्रह्मा भवो भवन्तश्च मनवो विबुधेश्वराः । विभूतयो मम ह्येता भूतानां भूतिहेतवः ।।४५
तपो मे हृदयं ब्रह्मंस्तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः । अङ्गानि क्रतवो जाता धर्म आत्मासवः सुराः ।।४६
अहमेवासमेवाग्रे नान्यत् किञ्चान्तरं बहिः । संज्ञानमात्रमव्यक्तं प्रसुप्तमिव विश्वतः ।।४७
मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतो गुणविग्रहः । यदाऽऽसीत् तत एवाद्यः स्वयम्भूः समभूदजः ।।४८
स वै यदा महादेवो मम वीर्योपबृंहितः । मेने खिलमिवात्मानमुद्यतः सर्गकर्मणि ।।४९
अथ मेऽभिहितो देवस्तपोऽतप्यत दारुणम् । नव विश्वसृजो युष्मान् येनादावसृजद्विभुः ।।५०
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