भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1144

स्वप्रोपलब्धार्थ इव तत्रैवान्तर्दधे हरिः ॥५४

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—विश्वके जीवनदाता भगवान् श्रीहरि यह कहकर दक्षके सामने ही इस प्रकार अन्तर्धान हो गये, जैसे स्वप्नमें देखी हुई वस्तु स्वप्न टूटते ही लुप्त हो जाती है ॥५४॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥


१. प्रा० पा०—यथायोगी। २. प्रा० पा०—वृक्षेभ्यः। १. प्रा० पा०—त्वादिश्टा। २. प्रा० पा०—लोकानां पितरौ। ३. प्रा० पा०—भूतानां शास्तास्ते। १.प्रा० पा०—स्वसंज्ञया। १. प्रा० पा०—वा०।

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