श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजैकपादहिर्बुध्न्यो बहुरूपो महानिति । रुद्रस्य पार्षदाश्चान्ये घोरा भूतविनायकाः ॥१८
प्रजापतेरङ्गिरसः स्वधा पत्नी पितॄनथ । अथर्वाङ्गिरसं वेदं पुत्रत्वे चाकरोत् सती ॥१९
कृशाश्वोऽर्चिषि भार्यायां धूम्रकेशमजीजनत् । धिषणायां वेदशिरो देवलं वयुनं मनुम् ॥२०
तार्क्ष्यस्य विनता कद्रूः पतङ्गी यामिनीति च । पतङ्ग्यसूत पतगान् यामिनी शलभानथ ॥२१
सुपर्णासूत गरुडं साक्षाद् यज्ञेशवाहनम् । सूर्यसूतमनूरुं च कद्रूर्नागाननेकशः ।॥२२
कृत्तिकादीनि नक्षत्राणीन्दोः पत्न्यस्तु भारत । दक्षशापात् सोऽनपत्यस्तासु यक्ष्मग्रहार्दितः ॥२३
अर्ककी पत्नी वासनाके गर्भसे तर्ष (तृष्णा) आदि पुत्र हुए। अग्नि नामक वसुकी पत्नी धाराके गर्भसे द्रविणक आदि बहुत-से पुत्र उत्पन्न हुए ॥१३॥ कृत्तिकापुत्र स्कन्द भी अग्निसे ही उत्पन्न हुए। उनसे विशाख आदिका जन्म हुआ। दोषकी पत्नी शर्वरीके गर्भसे शिशुमारका जन्म हुआ। वह भगवान्का कलावतार है ॥१४॥ वसुकी पत्नी आङ्गिरसीसे शिल्पकलाके अधिपति विश्वकर्माजी हुए। विश्वकर्माके उनकी भार्या कृतीके गर्भसे चाक्षुष मनु हुए और उनके पुत्र विश्वेदेव एवं साध्यगण हुए ॥१५॥ विभावसुकी पत्नी उषासे तीन पुत्र हुए—व्युष्ट, रोचिष् और आतप । उनमेंसे आतपके पंचयाम (दिवस) नामक पुत्र हुआ, उसीके कारण सब जीव अपने-अपने कार्योंमें लगे रहते हैं ॥१६॥ भूतकी पत्नी दक्षकन्दिनी सरूपाने कोटि-कोटि रुद्रगण उत्पन्न किये। इनमें रैवत, अज, भव, भीम, वाम, उग्र, वृषाकपि, अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, बहुरूप, और महान्—ये ग्यारह मुख्य हैं। भूतकी दूसरी पत्नी भूतासे भयंकर भूत और विनायकादिका जन्म हुआ। ये सब ग्यारहवें प्रधान रुद्र महान्के पार्षद हुए ॥१७-१८॥
अंगिरा प्रजापतिकी प्रथम पत्नी स्वधाने पितृगणको उत्पन्न किया और दूसरी पत्नी सतीने अथर्वांगिरस नामक वेदको ही पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया ॥१९॥ कृशाश्वकी पत्नी अर्चिसे धूम्रकेशका जन्म हुआ और धिषणासे चार पुत्र हुए—वेदशिरा, देवल, वयुन और मनु ॥२०॥ तार्क्ष्यनामधारी कश्यपकी चार स्त्रियाँ थीं—विनता, कद्रू, पतंगी और यामिनी। पतंगीसे पक्षियोंका और यामिनीसे शलभों (पतिंगों)-का जन्म हुआ ॥२१॥ विनताके पुत्र गरुड़ हुए, ये ही भगवान् विष्णुके वाहन हैं। विनताके ही दूसरे पुत्र अरुण हैं, जो भगवान्