भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1165

तस्मात् पितॄणामार्तानामार्तिं परपराभवम् । तपसापनयंस्तात सन्देशं कर्तुमर्हसि ॥३१

वृणीमहे त्वोपाध्यायं ब्रह्मिष्ठं ब्राह्मणं गुरुम् । यथाञ्जसा विजेष्यामः सपत्नांस्तव तेजसा ॥३२

न गर्हयन्ति ह्यर्थेषु यविष्ठाङ्घ्र्यभिवादनम् । छन्दोभ्योऽन्यत्र न ब्रह्मन् वयो ज्यैष्ठ्यस्य कारणम् ॥३३

ऋषिरुवाच

अभ्यर्थितः सुरगणैः पौरोहित्ये महातपाः । स विश्वरूपस्तानाह प्रसन्नः श्लक्ष्णया गिरा ॥३४

विश्वरूप उवाच

विगर्हितं धर्मशीलैर्ब्रह्मवर्च उपव्ययम् । कथं नु मद्विधो नाथा लोकेशैरभियाचितम् । प्रत्याख्यास्यति तच्छिष्यः स एव स्वार्थ उच्यते ॥३५

अकिञ्चनानां हि धनं शिलोञ्छनं तेनेह निर्वर्तितसाधुसत्क्रियः ।

जिन्हें सन्तान हो गयी हो, उन सत्पुत्रोंका भी सबसे बड़ा धर्म यही है कि वे अपने पिता तथा अन्य गुरुजनोंकी सेवा करें। फिर जो ब्रह्मचारी हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है ॥२८॥ वत्स! आचार्य वेदकी, पिता ब्रह्माजीकी, भाई इन्द्रकी और माता साक्षात् पृथ्वीकी मूर्ति होती है ॥२९॥ (इसी प्रकार) बहिन दयाकी, अतिथि धर्मकी, अभ्यागत अग्निकी और जगत्‌के सभी प्राणी अपने आत्माकी ही मूर्ति—आत्मस्वरूप होते हैं ॥३०॥ पुत्र! हम तुम्हारे पितर हैं। इस समय शत्रुओंने हमें जीत लिया है। हम बड़े दुःखी हो रहे हैं। तुम अपने तपोबलसे हमारा यह दुःख, दारिद्र्य, पराजय टाल दो। पुत्र! तुम्हें हमलोगोंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये ॥३१॥ तुम ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण हो, अतः जन्मसे ही हमारे गुरु हो। हम तुम्हें आचार्यके रूपमें वरण करके तुम्हारी शक्तिसे अनायास ही शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर लेंगे ॥३२॥

पुत्र! आवश्यकता पड़नेपर अपनेसे छोटोंका पैर छूना भी निन्दनीय नहीं है। वेदज्ञानको छोड़कर केवल अवस्था बड़प्पनका कारण भी नहीं है ॥३३॥

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