भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1189

अथ दशमोऽध्यायः देवताओंद्वारा दधीचि ऋषिकी अस्थियोंसे वज्र-निर्माण और वृत्रासुरकी सेनापर आक्रमण

श्रीशुक उवाच

इन्द्रमेवं समादिश्य भगवान् विश्वभावनः । पश्यतामनिमेषाणां तत्रैवान्तर्दधे हरिः ॥१

तथाभियाचितो देवैर्ऋषिरार्थवणो महान् । मोदमान उवाचेदं प्रहसन्निव भारत ॥२

अपि वृन्दारका यूयं न जानीथ शरीरिणाम् । संस्थायां यस्त्वभिद्रोहो दुःसहश्चेतनापहः ॥३

जिजीविषूणां जीवानामात्मा प्रेष्ठ इहेप्सितः । क उत्सहेत तं दातुं भिक्षमाणाय विष्णवे ॥४

देवा ऊचुः

किं नु तद् दुस्त्यजं ब्रह्मन् पुंसां भूतानुकम्पिनाम् । भवद्विधानां महतां पुण्यश्लोकेड्यकर्मणाम् ॥५

ननु स्वार्थपरो लोको न वेद परसंकटम् । यदि वेद न याचेत नेति नाह यदीश्वरः ॥६

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! विश्वके जीवनदाता श्रीहरि इन्द्रको इस प्रकार आदेश देकर देवताओंके सामने वहीं-के-वहीं अन्तर्धान हो गये ॥१॥

अब देवताओंने उदारशिरोमणि अथर्ववेदी दधीचि ऋषिके पास जाकर भगवान्‌के आज्ञानुसार याचना की। देवताओंकी याचना सुनकर दधीचि ऋषिको बड़ा आनन्द हुआ। उन्होंने हँसकर देवताओंसे कहा— ॥२॥ 'देवताओ! आपलोगोंको सम्भवतः यह बात नहीं मालूम है कि मरते समय प्राणियोंको बड़ा कष्ट होता है। उन्हें जबतक चेत रहता है, बड़ी असह्य पीड़ा सहनी पड़ती है और अन्तमें वे मूर्च्छित हो जाते हैं ॥३॥ जो जीव जगत्में जीवित रहना चाहते हैं, उनके लिये शरीर बहुत ही अनमोल, प्रियतम एवं अभीष्ट वस्तु है। ebook converter DEMO Watermarks*