श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनमुचिः शम्बरोऽनर्वा द्विमूर्धा ऋषभोऽम्बरः । हयग्रीवः शङ्कुशिरा विप्रचित्तिरयोमुखः ।।१९ पुलोमा वृषपर्वा च प्रहेतिर्हेतिरुत्कलः । दैतेया दानवा यक्षा रक्षांसि च सहस्रशः ।।२० सुमालिमालिप्रमुखाः कार्तस्वरपरिच्छदाः । प्रतिषिध्येन्द्रसेनाग्रं मृत्योरपि दुरासदम् ।।२१ अभ्यर्दयन्नसंभ्रान्ताः सिंहनादेन दुर्मदाः । गदाभिः परिघैर्बाणैः प्रासमुद्गरतोमरैः ।।२२ शूलैः परश्वधैः खड्गैः शतघ्नीभिर्भुशुण्डिभिः । सर्वतोऽवाकिरन् शस्त्रैस्त्रैश्च विबुधर्षभान् ।।२३ न तेऽदृश्यन्त संछन्नाः शरजालैः समन्ततः । पुङ्खानुपुङ्खपतितैर्ज्योतींषीव नभोगनैः ।।२४ न ते शस्त्रास्त्रवर्षौघा ह्यासेदुः सुरसैनिकान् । छिन्नाः सिद्धपथे देवैर्लघुहस्तैः सहस्रधा ।।२५ अथ क्षीणास्त्रशस्त्रौघा गिरिशृङ्गद्रुमोपलैः । अभ्यवर्षन् सुरबलं चिच्छिदुस्तांश्च पूर्ववत् ।।२६ तानक्षतान् स्वस्तिमतो निशाम्य शस्त्रास्त्रपूगैरथ वृत्रनाथाः । द्रुमैर्दृषद्विर्विविधाद्रिशृङ्गै- रविक्षतांस्त्रत्रसुरिन्द्रसैनिकान् ।।२७
जो वैवस्वत मन्वन्तर इस समय चल रहा है, इसकी पहली चतुर्युगीका त्रेतायुग अभी आरम्भ ही हुआ था। उसी समय नर्मदा तटपर देवताओंका दैत्योंके साथ यह भयंकर संग्राम हुआ ।।१६।। उस समय देवराज इन्द्र हाथमें वज्र लेकर रुद्र, वसु, आदित्य, दोनों अश्विनीकुमार, पितृगण, अग्नि, मरुद्गण, ऋभुगण, साध्यगण और विश्वेदेव आदिके साथ अपनी कान्तिसे शोभायमान हो रहे थे। वृत्रासुर आदि दैत्य उनको अपने सामने आया देख और भी चिढ़ गये ।।१७-१८।। तब नमुचि, शम्बर, अनर्वा, द्विमूर्धा, ऋषभ, अम्बर, हयग्रीव, शंकुशिरा, विप्रचित्ति, अयोमुख, पुलोमा, वृषपर्वा, प्रहेति, हेति, उत्कल, सुमाली, माली आदि हजारों दैत्य-दानव एवं यक्ष-राक्षस स्वर्णके साज-सामानसे सुसज्जित होकर देवराज इन्द्रकी सेनाको आगे बढ़नेसे रोकने लगे। परीक्षित! उस समय देवताओंकी सेना स्वयं मृत्युके लिये भी अजेय थी ।।१९-२१।। वे घमंडी असुर सिंहनाद करते हुए बड़ी सावधानीसे देवसेनापर प्रहार करने लगे। उन लोगोंने गदा, परिघ, बाण, प्रास, मुद्गर, तोमर, शूल, फरसे, तलवार, शतघ्नी (तोप), भुशुण्डि आदि अस्त्र-शस्त्रोंकी बौछारसे देवताओंको सब ओरसे ढक
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