श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृत्रग्रस्तं तमालक्ष्य सप्रजापतयः सुराः । हा कष्टमिति निर्विण्णाश्चुक्रुशुः समहर्षयः ॥३०
निगीर्णोऽप्यसुरेन्द्रेण न ममारोदरं गतः । महापुरुषसन्नद्धो योगमायाबलेन च ॥३१
भित्त्वा वज्रेण तत्कुक्षिं निष्क्रम्य बलभिद् विभुः । उच्चकर्त शिरः शत्रोर्गिरिशृङ्गमिवौजसा ॥३२
वज्रस्तु तत्कन्धरमाशुवेगः कृन्तन् समन्तात् परिवर्तमानः । न्यपातयत् तावदहर्गणेन यो ज्योतिषामयने वार्त्रहत्ये ॥३३
तदा च खे दुन्दुभयो विनेदु- र्गन्धर्वसिद्धाः समहर्षिसङ्घाः । वार्त्रघ्नलिङ्गैरस्तमभिष्टुवाना मन्त्रैर्मुदा कुसुमैरभ्यवर्षन् ॥३४
वृत्रस्य देहान्निष्क्रान्तमात्मज्योतिरिन्दम । पश्यतां सर्वलोकानामलोकं समपद्यत ॥३५
अब पैरोंसे चलने-फिरनेवाले पर्वतराजके समान अत्यन्त दीर्घकाय वृत्रासुरने अपनी ठोड़ीको धरतीसे और ऊपरके होठको स्वर्गसे लगाया तथा आकाशके समान गहरे मुँह, साँपके समान भयावनी जीभ एवं मृत्युके समान कराल दाढ़ोंसे मानो त्रिलोकीको निगलता, अपने पैरोंकी चोटसे पृथ्वीको रौंदता और प्रबल वेगसे पर्वतोंको उलटता-पलटता वह इन्द्रके पास आया और उन्हें उनके वाहन ऐरावत हाथीके सहित इस प्रकार लील गया, जैसे कोई परम पराक्रमी और अत्यन्त बलवान् अजगर हाथीको निगल जाय। प्रजापतियों और महर्षियोंके साथ देवताओंने जब देखा कि वृत्रासुर इन्द्रको निगल गया, तब तो वे अत्यन्त दुःखी हो गये तथा 'हाय-हाय! बड़ा अनर्थ हो गया।' यों कहकर विलाप करने लगे ॥२७-३०॥ बल दैत्यका संहार करनेवाले देवराज इन्द्रने महापुरुष-विद्या (नारायणकवच)-से अपनेको सुरक्षित कर रखा था और उनके पास योगमायाका बल था ही। इसलिये वृत्रासुरके निगल लेनेपर—उसके पेटमें पहुँचकर भी वे मरे नहीं ॥३१॥ उन्होंने अपने वज्रसे उसकी कोख फाड़ डाली और उसके पेटसे निकलकर बड़े वेगसे उसका पर्वत-शिखरके समान ऊँचा सिर काट डाला ॥३२॥ सूर्यादि ग्रहोंकी उत्तरायण-दक्षिणायनरूप
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