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श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

पृष्ठ 1215, कुल 1617 में से

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पृष्ठ 1215

श्रुतं द्वैपायनमुखान्नारदाद्देवलादपि ॥९

राजा परीक्षित्ने कहा—भगवन्! वृत्रासुरका स्वभाव तो बड़ा रजोगुणी-तमोगुणी था। वह देवताओंको कष्ट पहुँचाकर पाप भी करता ही था। ऐसी स्थितिमें भगवान् नारायणके चरणोंमें उसकी सुदृढ़ भक्ति कैसे हुई? ॥१॥ हम देखते हैं कि प्रायः शुद्ध सत्त्वमय देवता और पवित्रहृदय ऋषि भी भगवान्‌की परम प्रेममयी अनन्य भक्तिसे वंचित ही रह जाते हैं। सचमुच भगवान्‌की भक्ति बड़ी दुर्लभ है ॥२॥ भगवन्! इस जगत्‌के प्राणी पृथ्वीके धूलिकणोंके समान ही असंख्य हैं। उनमेंसे कुछ मनुष्य आदि श्रेष्ठ जीव ही अपने कल्याणकी चेष्टा करते हैं ॥३॥ ब्रह्मन्! उनमें भी संसारसे मुक्ति चाहनेवाले तो बिरले ही होते हैं और मोक्ष चाहनेवाले हजारोंमें मुक्ति या सिद्धि लाभ तो कोई-सा ही कर पाता है ॥४॥ महामुने! करोड़ों सिद्ध एवं मुक्त पुरुषोंमें भी वैसे शान्तचित्त महापुरुषका मिलना तो बहुत ही कठिन है, जो एकमात्र भगवान्‌के ही परायण हो ॥५॥

ऐसी अवस्थामें वह वृत्रासुर, जो सब लोगोंको सताता था और बड़ा पापी था, उस भयंकर युद्धके अवसरपर भगवान् श्रीकृष्णमें अपनी वृत्तियोंको इस प्रकार दृढ़तासे लगा सका—इसका क्या कारण है? ॥६॥ प्रभो! इस विषयमें हमें बहुत अधिक सन्देह है और सुननेका बड़ा कौतूहल भी है। अहो, वृत्रासुरका बल-पौरुष कितना महान् था कि उसने रणभूमिमें देवराज इन्द्रको भी सन्तुष्ट कर दिया ॥७॥

सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! भगवान् शुकदेवजीने परम श्रद्धालु राजर्षि परीक्षित्‌का यह श्रेष्ठ प्रश्न सुनकर उनका अभिनन्दन करते हुए यह बात कही ॥८॥

श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! तुम सावधान होकर यह इतिहास सुनो। मैंने इसे अपने पिता व्यासजी, देवर्षि नारद और महर्षि देवलके मुँहसे भी विधिपूर्वक सुना है ॥९॥

आसीद्राजा सार्वभौमः शूरसेनेषु वै नृप । चित्रकेतुरिति ख्यातो यस्यासीत् कामधुङ्मही ॥१०

तस्य भार्यासहस्राणां सहस्राणि दशाभवन् । सान्तानिकश्चापि नृपो न लेभे तासु सन्ततिम् ॥११

रूपौदार्यवयोजन्मविद्यैश्वर्यश्रियादिभिः । सम्पन्नस्य गुणैः सर्वैश्चिन्ता वन्ध्यापतेरभूत् ॥१२

न तस्य संपदः सर्वा महिष्यो वामलोचनाः । सार्वभौमस्य भूश्चेयमभवन् प्रीतिहेतवः ॥१३

तस्यैकदा तु भवनमङ्गिरा भगवानृषिः ।

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