भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1225

अथ पञ्चदशोऽध्यायः चित्रकेतुको अंगिरा और नारदजीका उपदेश

श्रीशुक उवाच

ऊचतुर्मृतकोपान्ते पतितं मृतकोपमम् । शोकाभिभूतं राजानं बोधयन्तौ सदुक्तिभिः ॥१

कोऽयं स्यात् तव राजेन्द्र भवान् यमनुशोचति । त्वं चास्य कतमः सृष्टौ पुरेदानीमतः परम् ॥२

यथा प्रयान्ति संयान्ति स्रोतोवेगेन वालुकाः । संयुज्यन्ते वियुज्यन्ते तथा कालेन देहिनः ॥३

यथा धानासु वै धाना भवन्ति न भवन्ति च । एवं भूतेषु भूतानि चोदितानीशमायया ॥४

वयं च त्वं च ये चेमे तुल्यकालाश्चराचराः । जन्ममृत्योर्यथा पश्चात् प्राङ्नैवमधुनापि भोः ॥५

भूतैर्भूतानि भूतेशः सृजत्यवति हन्त्यजः । आत्मसृष्टैरस्वतन्त्रैरनपेक्षोऽपि बालवत् ॥६

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! राजा चित्रकेतु शोकग्रस्त होकर मुर्देके समान अपने मृत पुत्रके पास ही पड़े हुए थे। अब महर्षि अंगिरा और देवर्षि नारद उन्हें सुन्दर-सुन्दर उक्तियोंसे समझाने लगे ॥१॥ उन्होंने कहा—राजेन्द्र! जिसके लिये तुम इतना शोक कर रहे हो, वह बालक इस जन्म और पहलेके जन्मोंमें तुम्हारा कौन था? उसके तुम कौन थे? और अगले जन्मोंमें भी उसके साथ तुम्हारा क्या सम्बन्ध रहेगा? ॥२॥

जैसे जलके वेगसे बालूके कण एक-दूसरेसे जुड़ते और बिछुड़ते रहते हैं, वैसे ही समयके प्रवाहमें प्राणियोंका भी मिलन और बिछोह होता रहता है ॥३॥ राजन्! जैसे कुछ बीजोंसे दूसरे बीज उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही भगवान्‌की मायासे प्रेरित होकर प्राणियोंसे अन्य प्राणी उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं ॥४॥ राजन्! हम, तुम और हमलोगोंके साथ इस जगत्‌में जितने भी चराचर प्राणी वर्तमान हैं—वे सब अपने जन्मके पहले नहीं थे और मृत्युके पश्चात् नहीं रहेंगे। इससे सिद्ध है कि इस समय भी उनका अस्तित्व

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