श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअधुना पुत्रिणां तापो भवतैवानुभूयते । एवं दारा गृहा रायो३ विविधैश्वर्यसम्पदः ॥२१
शब्दादयश्च विषयाश्चला राज्यविभूतयः । मही राज्यं बलं कोशो भृत्यामात्याः सुहृज्जनाः ॥२२
सर्वेऽपि शूरसेनेमे शोकमोहभयार्त्तिदाः । गन्धर्वनगरप्रख्याः स्वप्नमायामनोरथाः ॥२३
दृश्यमाना विनार्थेन न दृश्यन्ते मनोभवाः । कर्मभिर्ध्यायतो नानाकर्माणि मनसोऽभवन् ॥२४
अयं हि देहिनो देहो द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः । देहिनो विविधक्लेशसन्तापकृदुदाहृतः ॥२५
महर्षि अंगिराने कहा—राजन्! जिस समय तुम पुत्रके लिये बहुत लालायित थे, तब मैंने ही तुम्हें पुत्र दिया था। मैं अंगिरा हूँ। ये जो तुम्हारे सामने खड़े हैं, स्वयं ब्रह्माजीके पुत्र सर्वसमर्थ देवर्षि नारद हैं ॥१७॥ जब हमलोगोंने देखा कि तुम पुत्रशोकके कारण बहुत ही घने अज्ञानान्धकारमें डूब रहे हो, तब सोचा कि तुम भगवान्के भक्त हो, शोक करनेयोग्य नहीं हो। अतः तुमपर अनुग्रह करनेके लिये ही हम दोनों यहाँ आये हैं। राजन्! सच्ची बात तो यह है कि जो भगवान् और ब्राह्मणोंका भक्त है, उसे किसी अवस्थामें शोक नहीं करना चाहिये ॥१८-१९॥
जिस समय पहले-पहल मैं तुम्हारे घर आया था, उसी समय मैं तुम्हें परम ज्ञानका उपदेश देता; परन्तु मैंने देखा कि अभी तो तुम्हारे हृदयमें पुत्रकी उत्कट लालसा है, इसलिये उस समय तुम्हें ज्ञान न देकर मैंने पुत्र ही दिया ॥२०॥ अब तुम स्वयं अनुभव कर रहे हो कि पुत्रवानोंको कितना दुःख होता है। यही बात स्त्री, घर, धन, विविध प्रकारके ऐश्वर्य, सम्पत्तियाँ, शब्द-रूप-रस आदि विषय, राज्यवैभव, पृथ्वी, राज्य, सेना, खजाना, सेवक, अमात्य, सगे-सम्बन्धी, इष्ट-मित्र सबके लिये हैं; क्योंकि ये सब-के-सब अनित्य हैं ॥२१-२२॥ शूरसेन! अतएव ये सभी शोक, मोह, भय और दुःखके कारण हैं, मनके खेल-खिलौने हैं, सर्वथा कल्पित और मिथ्या हैं; क्योंकि ये न होनेपर भी दिखायी पड़ रहे हैं। यही कारण है कि ये एक क्षण दीखनेपर भी दूसरे क्षण लुप्त हो जाते हैं। ये गन्धर्वनगर, स्वप्न, जादू और मनोरथकी वस्तुओंके समान सर्वथा असत्य हैं। जो लोग कर्म-वासनाओंसे प्रेरित होकर विषयोंका चिन्तन करते रहते हैं; उन्हींका मन अनेक प्रकारके कर्मोंकी सृष्टि करता है ॥२३-२४॥ जीवात्माका यह देह—जो पंचभूत, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियोंका संघात है—जीवको विविध प्रकारके क्लेश और सन्ताप देनेवाली कही जाती है ॥२५॥