श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ षोडशोऽध्यायः चित्रकेतुका वैराग्य तथा संकर्षणदेवके दर्शन
श्रीशुक उवाच
अथ देवऋषी राजन् सम्परेतं नृपात्मजम् । दर्शयित्वेति होवाच ज्ञातीनामनुशोचताम् ॥१॥
नारद उवाच
जीवात्मन् पश्य भद्रं ते मातरं पितरं च ते । सुहृदो बान्धवास्तप्ताः शुचा त्वत्कृतया भृशम् ॥२ कलेवरं स्वमाविश्य शेषमायुः सुहृद्वृतः । भुङ्क्ष्व भोगान् पितृप्रत्तानधितिष्ठ नृपासनम् ॥३
जीव उवाच
कस्मिञ्जन्मन्ममी मह्यं पितरो मातरोऽभवन् । कर्मभिर्भ्राम्यमाणस्य देवतिर्यङ्नृयोनिषु ॥४
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! तदनन्तर देवर्षि नारदने मृत राजकुमारके जीवात्माको शोकाकुल स्वजनोंके सामने प्रत्यक्ष बुलाकर कहा ॥१॥ देवर्षि नारदने कहा—जीवात्मन्! तुम्हारा कल्याण हो। देखो, तुम्हारे माता-पिता, सुहृद्-सम्बन्धी तुम्हारे वियोगसे अत्यन्त शोकाकुल हो रहे हैं ॥२॥ इसलिये तुम अपने शरीरमें आ जाओ और शेष आयु अपने सगे-सम्बन्धियोंके साथ ही रहकर व्यतीत करो। अपने पिताके दिये हुए भोगोंको भोगो और राजसिंहासनपर बैठो ॥३॥ जीवात्माने कहा—देवर्षिजी! मैं अपने कर्मोंके अनुसार देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि योनियोंमें न जाने कितने जन्मोंसे भटक रहा हूँ। उनमेंसे ये लोग किस जन्ममें मेरे माता-पिता हुए? ॥४॥
बन्धुज्ञात्यरिमध्यस्थमित्रोदासीनविद्विषः । सर्व एव हि सर्वेषां भवन्ति क्रमशो मिथः ॥५
यथा वस्तूनि पण्यानि हेमादीनि ततस्ततः ।
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