श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर देता है ॥९॥ इसका न तो कोई अत्यन्त प्रिय है और न अप्रिय, न अपना और न पराया। क्योंकि गुण-दोष (हित-अहित) करनेवाले मित्र-शत्रु आदिकी भिन्न-भिन्न बुद्धि-वृत्तियोंका यह अकेला ही साक्षी है; वास्तवमें यह अद्वितीय है ॥१०॥ यह आत्मा कार्य-कारणका साक्षी और स्वतन्त्र है। इसलिये यह शरीर आदिके गुण-दोष अथवा कर्मफलको ग्रहण नहीं करता, सदा उदासीनभावसे स्थित रहता है ॥११॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—वह जीवात्मा इस प्रकार कहकर चला गया। उसके सगे-सम्बन्धी उसकी बात सुनकर अत्यन्त विस्मित हुए। उनका स्नेह-बन्धन कट गया और उसके मरनेका शोक भी जाता रहा ॥१२॥ इसके बाद जातिवालोंने बालककी मृत देहको ले जाकर तत्कालोचित संस्कार और और्ध्वदैहिक क्रियाएँ पूर्ण कीं और उस दुस्त्यज स्नेहको छोड़ दिया, जिसके कारण शोक, मोह, भय और दुःखकी प्राप्ति होती है ॥१३॥
बालघ्न्यो व्रीडितास्तत्र बालहत्याहतप्रभाः । बालहत्याव्रतं चेरुर्ब्राह्मणैर्यन्निरूपितम् । यमुनायां महाराज स्मरन्त्यो द्विजभाषितम् ॥१४
स इत्थं प्रतिबुद्धात्मा चित्रकेतुर्द्विजोक्तिभिः । गृहान्धकूपान्निष्क्रान्तः सरःपङ्कादिव द्विपः ॥१५
कालिन्द्यां विधिवत् स्नात्वा कृतपुण्यजलक्रियः । मौनेन संयतप्राणो ब्रह्मपुत्राववन्दत ॥१६
अथ तस्मै प्रपन्नाय भक्ताय प्रयतात्मने । भगवान्नारदः प्रीतो विद्यामेतामुवाच ह ॥१७
ॐ नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय धीमहि । प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः सङ्कर्षणाय च ॥१८
नमो विज्ञानमात्राय परमानन्दमूर्तये । आत्मारामाय शान्ताय निवृत्तद्वैतदृष्टये ॥१९
आत्मानन्दानुभूत्यैव न्यस्तशक्त्यूर्मये नमः । हृषीकेशाय महते नमस्ते विश्वमूर्तये ॥२०
वचस्युपरतेऽप्राप्य य एको मनसा सह । अनामरूपश्चिन्मात्रः सोऽव्यान्नः सदसत्परः ॥२१
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