श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसकती ।।५८।।
स्मृत्वेहायां परिक्लेशं ततः फलविपर्ययम् । अभयं चाप्यनीहायां सङ्कल्पाद्विरमेत्कविः ।।५९
सुखाय दुःखमोक्षाय कुर्वाते दम्पती क्रियाः । ततोऽनिवृत्तिरप्राप्तिर्दुःखस्य च सुखस्य च ।।६०
एवं विपर्ययं बुद्ध्वा नृणां विज्ञाभिमानिनाम् । आत्मनश्च गतिं सूक्ष्मां स्थानत्रयविलक्षणाम् ।।६१
दृष्टश्रुताभिर्मात्राभिर्निर्मुक्तः स्वेन तेजसा । ज्ञानविज्ञानसन्तुष्टो मद्भक्तः पुरुषो भवेत् ।।६२
एतावानेव मनुजैर्योगनैपुण्यबुद्धिभिः । स्वार्थः सर्वात्मना ज्ञेयो यत्परात्मैकदर्शनम् ।।६३
त्वमेतच्छ्रद्धया राजन्नप्रमत्तो वचो मम । ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो धारयन्नाशु सिध्यसि ।।६४
श्रीशुक उवाच
आश्वास्य भगवानित्थं चित्रकेतुं जगद्गुरुः । पश्यतस्तस्य विश्वात्मा ततश्चान्तर्दधे हरिः ।।६५
राजन्! सांसारिक सुखके लिये जो चेष्टाएँ की जाती हैं, उनमें श्रम है, क्लेश है और जिस परम सुखके उद्देश्यसे वे की जाती हैं, उसके ठीक विपरीत परम दुःख देती हैं; किन्तु कर्मोंसे निवृत्त हो जानेमें किसी प्रकारका भय नहीं है—यह सोचकर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि किसी प्रकारके कर्म अथवा उनके फलोंका संकल्प न करे ।।५९।। जगत्के सभी स्त्री-पुरुष इसलिये कर्म करते हैं कि उन्हें सुख मिले और उनका दुःखोंसे पिण्ड छूटे; परन्तु उन कर्मोंसे न तो उनका दुःख दूर होता है और न उन्हें सुखकी ही प्राप्ति होती है ।।६०।।
जो मनुष्य अपनेको बहुत बड़ा बुद्धिमान् मानकर कर्मके पचड़ोंमें पड़े हुए हैं, उनको विपरीत फल मिलता है—यह बात समझ लेनी चाहिये; साथ ही यह भी जान लेना चाहिये कि आत्माका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओं तथा इनके अभिमानियोंसे विलक्षण है ।।६१।। यह जानकर इस लोकमें देखे और परलोकके सुने हुए
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