श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहर्षि अगस्त्यके आतिथ्यके समय वातापिको पकाकर उन्हें खिला दिया था ।।१५।। अनुह्लादकी पत्नी सूर्म्मा थी, उसके दो पुत्र हुए—बाष्कल और महिषासुर। प्रह्लादका पुत्र था विरोचन। उसकी पत्नी देवीके गर्भसे दैत्यराज बलिक जन्म हुआ ।।१६।। बलिकी पत्नीका नाम अशना था। उससे बाण आदि सौ पुत्र हुए। दैत्यराज बलिकी महिमा गान करनेयोग्य है। उसे मैं आगे (आठवें स्कन्धमें) सुनाऊँगा ।।१७।। बलिक पुत्र बाणासुर भगवान् शंकरकी आराधना करके उनके गणोंका मुखिया बन गया। आज भी भगवान् शंकर उसके नगरकी रक्षा करनेके लिये उसके पास ही रहते हैं ।।१८।। दितिके हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्षके अतिरिक्त उनचास पुत्र और थे। उन्हें मरुद्गण कहते हैं। वे सब निःसन्तान रहे। देवराज इन्द्रने उन्हें अपने ही समान देवता बना लिया ।।१९।।
राजा परीक्षित्ने पूछा—भगवन्! मरुद्गणने ऐसा कौन-सा सत्कर्म किया था, जिसके कारण वे अपने जन्मजात असुरोचित भावको छोड़ सके और देवराज इन्द्रके द्वारा देवता बना लिये गये? ।।२०।। ब्रह्मन्! मेरे साथ यहाँकी सभी ऋषिमण्डली यह बात जाननेके लिये अत्यन्त उत्सुक हो रही है। अतः आप कृपा करके विस्तारसे वह रहस्य बतलाइये ।।२१।।
सूत उवाच
तद्विष्णुरातस्य स बादरायणि- र्वचो निशम्यादृतमल्पमर्थवत् १। सभाजयन् २ संनिभृतेन चेतसा जगाद सत्रायण सर्वदर्शनः ।।२२
श्रीशुक उवाच
हतपुत्रा दितिः शक्रपाष्णिग्राहेण विष्णुना । मन्युना शोकदीप्तेन ज्वलन्ती पर्यचिन्तयत् ।।२३
कदा नु भ्रातृहन्तारमिन्द्रियाराममुल्बणम् । अक्लिन्नहृदयं पापं घातयित्वा शये सुखम् ।।२४
कृमिविड्भस्मसंज्ञाऽऽसीद्यस्येशाभिहितस्य च । भूतध्रुक् तत्कृते स्वार्थं किं वेद निरयो यतः ।।२५
आशासानस्य तस्येदं ध्रुवमुन्नद्धचेतसः । मदशोषक इन्द्रस्य भूयाद्येन सुतो हि मे ।।२६