श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपास जाता है, वैसे ही देवराज इन्द्र भी कपटवेष धारण करके व्रतपरायणा दितिके व्रतपालनकी त्रुटि पकड़नेके लिये उसकी सेवा करने लगे ॥५८॥ सर्वदा पैनी दृष्टि रखनेपर भी उन्हें उसके व्रतमें किसी प्रकारकी त्रुटि न मिली और वे पूर्ववत् उसकी सेवा-टहलमें लगे रहे। अब तो इन्द्रको बड़ी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे—मैं ऐसा कौन-सा उपाय करूँ, जिससे मेरा कल्याण हो? ॥५९॥
दिति व्रतके नियमोंका पालन करते-करते बहुत दुर्बल हो गयी थी। विधाताने भी उसे मोहमें डाल दिया। इसलिये एक दिन सन्ध्याके समय झूठे मुँह, बिना आचमन किये और बिना पैर धोये ही वह सो गयी ॥६०॥ योगेश्वर इन्द्रने देखा कि यह अच्छा अवसर हाथ लगा। वे योगबलसे झटपट सोयी हुई दितिके गर्भमें प्रवेश कर गये ॥६१॥ उन्होंने वहाँ जाकर सोनेके समान चमकते हुए गर्भके वज्रके द्वारा सात टुकड़े कर दिये। जब वह गर्भ रोने लगा, तब उन्होंने 'मत रो, मत रो' यह कहकर सातों टुकड़ोंमेंसे एक-एकके और भी सात टुकड़े कर दिये ॥६२॥
ते तमूचुः पाट्यमानाः सर्वे प्राञ्जलयो नृप । नो जिघांससि किमिन्द्र भ्रातरो मरुतस्तव ॥६३
मा भैष्ट भ्रातरो मह्यं यूयमित्याह कौशिकः । अनन्यभावान् पार्षदानात्मनो मरुतां गणान् ॥६४
न ममार दितेर्गर्भः श्रीनिवासानुकम्पया । बहुधा कुलिशक्षुण्णो द्रौण्यस्त्रेण यथा भवान् ॥६५
सकृदिष्ट्वाऽऽदिपुरुषं पुरुषो याति साम्यताम् । संवत्सरं किञ्चिदूनं दित्या यद्धरिरर्चितः ॥६६
सजूरिन्द्रेण पञ्चाशद्देवास्ते मरुतोऽभवन् । व्यपोह्य मातृदोषं ते हरिणा सोमपाः कृताः ॥६७
दितिरुत्थाय ददृशे कुमाराननलप्रभान् । इन्द्रेण सहितान् देवी पर्यतुष्यदनिन्दिता ॥६८
अथेन्द्रमाह ताताहमादित्यानां भयावहम् । अपत्यमिच्छन्त्यचरं व्रतमेतत्सुदुष्करम् ॥६९
एकः सङ्कल्पितः पुत्रः सप्त सप्ताभवन् कथम् । यदि ते विदितं पुत्र सत्यं कथय मा मृषा ॥७०