श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअहो अकरुणो देवः स्त्रियाऽऽकरुणया विभुः । कृपणं मानुशोचन्त्या दीनया किं करिष्यति ।।५३
कामं नयतु मां देवः किमर्धेनात्मनो हि मे । दीनेन जीवता दुःखमनेन विधुरायुषा ।।५४
कथं त्वजातपक्षांस्तान् मातृहीनान् बिभर्म्यहम् । मन्दभाग्याः प्रतीक्षन्ते नीडे मे मातरं प्रजाः ।।५५
एवं कुलिङ्गं विलपन्तमार्रात् प्रियावियोगातुरमश्रुकण्ठम् । स एव तं शाकुनिकः शरेण विव्याध कालप्रहितो विलीनः ।।५६
एवं यूयमपश्यन्त्य आत्मापायमबुद्धयः । नैनं प्राप्स्यथ शोचन्त्यः पतिं वर्षशतैरपि ।।५७
इसलिये शरीर और आत्माका तत्त्व जाननेवाले पुरुष न तो अनित्य शरीरके लिये शोक करते हैं और न नित्य आत्माके लिये ही। परन्तु ज्ञानकी दृढ़ता न होनेके कारण जो लोग शोक करते रहते हैं, उनका स्वभाव बदलना बहुत कठिन है ।।४९।।
किसी जंगलमें एक बहेलिया रहता था। वह बहेलिया क्या था, विधाताने मानो उसे पक्षियोंके कालरूपमें ही रच रखा था। जहाँ-कहीं भी वह जाल फैला देता और ललचाकर चिड़ियोंको फँसा लेता ।।५०।। एक दिन उसने कुलिंग पक्षीके एक जोड़ेको चारा चुगते देखा। उनमेंसे उस बहेलियेने मादा पक्षीको तो शीघ्र ही फँसा लिया ।।५१।। कालवश वह जालके फंदोंमें फँस गयी। नर पक्षीको अपनी मादाकी विपत्तिको देखकर बड़ा दुःख हुआ। वह बेचारा उसे छुड़ा तो सकता न था, स्नेहसे उस बेचारीके लिये विलाप करने लगा ।।५२।। उसने कहा—‘यों तो विधाता सब कुछ कर सकता है। परन्तु है वह बड़ा निर्दयी। यह मेरी सहचरी एक तो स्त्री है, दूसरे मुझ अभागेके लिये शोक करती हुई बड़ी दीनतासे छटपटा रही है। इसे लेकर वह करेगा क्या ।।५३।। उसकी मौज हो तो मुझे ले जाय। इसके बिना मैं अपना यह अधूरा विधुर जीवन, जो दीनता और दुःखसे भरा हुआ है, लेकर क्या करूँगा ।।५४।। अभी मेरे अभागे बच्चोंके पर भी नहीं जमे हैं। स्त्रीके मर जानेपर उन मातृहीन बच्चोंको मैं कैसे पालूूँगा? ओह! घोंसलेमें वे अपनी माँकी बाट देख रहे होंगे’ ।।५५।। इस तरह वह पक्षी बहुत-सा विलाप करने लगा। अपनी सहचरीके वियोगसे वह आतुर हो रहा था। आँसुओंके मारे उसके गला रुँध गया था। तबतक कालकी प्रेरणासे पास ही छिपे हुए उसी बहेलियेने ऐसा बाण मारा कि वह भी वहींपर लोट गया ।।५६।। मूर्ख रानियो! तुम्हारी भी यही दशा