भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

पृष्ठ 1302, कुल 1617 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1302

त्रिभिस्तपोयोगबलौजसां पदम् ।।१३

जगुर्महेन्द्रासनमोजसा स्थितं विश्वावसुस्तुम्बुरुरस्मदादयः२ । गन्धर्वसिद्धा ऋषयोऽस्तुवन्मुहु- र्विद्याधरा अप्सरसश्च पाण्डव ।।१४

स एव वर्णाश्रमिभिः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । इज्यमानो हविर्भागानग्रहीत् स्वेन तेजसा ।।१५

अकृष्टपच्या तस्यासीत् सप्तद्वीपवती मही । तथा कामदुघा द्यौस्तु नानाश्र्चर्यपदं नभः ।।१६

रत्नाकराश्च रत्नौघांस्तत्पत्न्यश्चोहूरूर्मिभिः । क्षारसीधुघृतक्षौद्रदधिक्षीरामृतोदकाः ।।१७

शैला द्रोणीभिराक्रीडं सर्वर्तुषु गुणान् द्रुमाः । दधार लोकपालानामेक एव पृथग्गुणान् ।।१८

सर्वांगसुन्दरी अप्सराएँ अपने नूपुरोंसे रुन-झुन ध्वनि करती हुई रत्नमय भूमिपर इधर-उधर टहला करती थीं और कहीं-कहीं उसमें अपना सुन्दर मुख देखने लगती थीं ।।११।। उस महेन्द्रके महलमें महाबली और महामनस्वी हिरण्यकशिपु सब लोकोंको जीतकर, सबका एकच्छत्र सम्राट् बनकर बड़ी स्वतन्त्रतासे विहार करने लगा। उसका शासन इतना कठोर था कि उससे भयभीत होकर देव-दानव उसके चरणोंकी वन्दना करते रहते थे ।।१२।। युधिष्ठिर! वह उत्कट गन्धवाली मदिरा पीकर मतवाला रहा करता था। उसकी आँखें लाल-लाल और चढ़ी हुई रहतीं। उस समय तपस्या, योग, शारीरिक और मानसिक बलका वह भंडार था। ब्रह्मा, विष्णु और महादेवके सिवा और सभी देवता अपने हाथोंमें भेंट ले-लेकर उसकी सेवामें लगे रहते ।।१३।। जब वह अपने पुरुषार्थसे इन्द्रासनपर बैठ गया, तब युधिष्ठिर! विश्वावसु, तुम्बुरु तथा हम सभी लोग उसके सामने गान करते थे। गन्धर्व, सिद्ध, ऋषिगण, विद्याधर और अप्सराएँ बार-बार उसकी स्तुति करती थीं ।।१४।।

युधिष्ठिर! वह इतना तेजस्वी था कि वर्णाश्रमधर्मका पालन करनेवाले पुरुष जो बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञ करते, उनके यज्ञोंकी आहुति वह स्वयं छीन लेता ।।१५।। पृथ्वीके सातों द्वीपोंमें उसका अखण्ड राज्य था। सभी जगह बिना ही जोते-बोये धरतीसे अन्न पैदा होता था। वह जो कुछ चाहता, अन्तरिक्षसे उसे मिल जाता तथा आकाश उसे भाँति-भाँतिकी आश्चर्यजनक वस्तुएँ दिखा-दिखाकर उसका मनोरंजन करता था ।।१६।। इसी प्रकार खारे

ebook converter DEMO Watermarks*