श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयोंका स्वच्छन्द उपभोग करने लगा। परन्तु इतने विषयोंसे भी उसकी तृप्ति न हो सकी। क्योंकि अन्ततः वह इन्द्रियोंका दास ही तो था ॥१९॥
युधिष्ठिर! इस रूपमें भी वह भगवान्का वही पार्षद है, जिसे सनकादिकोंने शाप दिया था। वह ऐश्वर्यके मदसे मतवाला हो रहा था तथा घमंडमें चूर होकर शास्त्रोंकी मर्यादाका उल्लंघन कर रहा था। देखते-ही-देखते उसके जीवनका बहुत-सा समय बीत गया ॥२०॥ उसके कठोर शासनसे सब लोक और लोकपाल घबरा गये। जब उन्हें और कहीं किसीका आश्रय न मिला, तब उन्होंने भगवान्की शरण ली ॥२१॥ (उन्होंने मन-ही-मन कहा—) ‘जहाँ सर्वात्मा जगदीश्वर श्रीहरि निवास करते हैं और जिसे प्राप्त करके शान्त एवं निर्मल संन्यासी महात्मा फिर लौटते नहीं, भगवान्के उस परम धामको हम नमस्कार करते हैं’ ॥२२॥ इस भावसे अपनी इन्द्रियोंका संयम और मनको समाहित करके उन लोगोंने खाना-पीना और सोना छोड़ दिया तथा निर्मल हृदयसे भगवान्की आराधना की ॥२३॥ एक दिन उन्हें मेघके समान गम्भीर आकाशवाणी सुनायी पड़ी। उसकी ध्वनिसे दिशाएँ गूँज उठीं। साधुओंको अभय देनेवाली वह वाणी यों थी— ॥२४॥ ‘श्रेष्ठ देवताओ! डरो मत। तुम सब लोगोंका कल्याण हो। मेरे दर्शनसे प्राणियोंको परम कल्याणकी प्राप्ति हो जाती है ॥२५॥ इस नीच दैत्यकी दुष्टताका मुझे पहलेसे ही पता है। मैं इसको मिटा दूँगा। अभी कुछ दिनोंतक समयकी प्रतीक्षा करो ॥२६॥
कोई भी प्राणी जब देवता, वेद, गाय, ब्राह्मण, साधु, धर्म और मुझसे द्वेष करने लगता है, तब शीघ्र ही उसका विनाश हो जाता है ॥२७॥ जब यह अपने वैरहीन, शान्त और महात्मा पुत्र प्रह्लादसे द्रोह करेगा—उसका अनिष्ट करना चाहेगा, तब वरके कारण शक्तिसम्पन्न होनेपर भी इसे मैं अवश्य मार डालूँगा।’ ॥२८॥
नारद उवाच
इत्युक्ता लोकगुरुणा तं प्रणम्य दिवौकसः । न्यवर्तन्त गतोद्वेगा मेनिरे चासुरं हतम् ॥२९
तस्य दैत्यपतेः पुत्राश्चत्वारः परमाद्भुताः । प्रह्लादोऽभून्महांस्तेषां गुणैर्महदुपासकः ॥३०
ब्रह्मण्यः शीलसम्पन्नः सत्यसन्धो जितेन्द्रियः । आत्मवत्सर्वभूतानामेकः प्रियसुहृत्तमः ॥३१
दासवत्संनतार्याङ्घ्रिः पितृवद्दीनवत्सलः । भ्रातृवत्सदृशे स्निग्धो गुरुष्वीश्वरभावनः । विद्यार्थरूपजन्माढ्यो मानस्तम्भविवर्जितः ॥३२
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