भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1306

कृष्णग्रहगृहीतात्मा न वेद जगदीदृशम् ॥३७

आसीनः पर्यटन्नश्नन् शयानः प्रपिबन् ब्रुवन् । नानुसन्धत्त एतानि गोविन्दपरिरम्भितः ॥३८

क्वचिद्रुदति वैकुण्ठचिन्ताशबलचेतनः । क्वचिद्धसति तच्चिन्ताह्लाद उद्गायति क्वचित् ॥३९

नदति क्वचिदुत्कण्ठो विलज्जो नृत्यति क्वचित् । क्वचित्तद्भावनायुक्तस्तन्मयोऽनुचकार ह ॥४०

क्वचिदुत्पुलकस्तूष्णीमास्ते संस्पर्शनिर्वृतः । अस्पन्दप्रणयानन्दसलिलामीलितेक्षणः ॥४१

स उत्तमश्लोकपदारविन्दयो- र्निषेवयाकिञ्चनसङ्गलब्धया । तन्वन् परां निर्वृतिमत्मनो मुहु- र्दुःसङ्गदीनान्यमनःशमं व्यधात् ॥४२

उनकी महिमाका वर्णन करनेके लिये अगणित गुणोंके कहने-सुननेकी आवश्यकता नहीं। केवल एक ही गुण—भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें स्वाभाविक, जन्मजात प्रेम उनकी महिमाको प्रकट करनेके लिये पर्याप्त है ॥३६॥

युधिष्ठिर! प्रह्लाद बचपनमें ही खेल-कूद छोड़कर भगवान्‌के ध्यानमें जडवत् तन्मय हो जाया करते। भगवान् श्रीकृष्णके अनुग्रहरूप ग्रहने उनके हृदयको इस प्रकार खींच लिया था कि उन्हें जगत्‌की कुछ सुध-बुध ही न रहती ॥३७॥ उन्हें ऐसा जान पड़ता कि भगवान् मुझे अपनी गोदमें लेकर आलिंगन कर रहे हैं। इसलिये उन्हें सोते-बैठते, खाते-पीते, चलते-फिरते और बातचीत करते समय भी इन बातोंका ध्यान बिलकुल न रहता ॥३८॥ कभी-कभी भगवान् मुझे छोड़कर चले गये, इस भावनामें उनका हृदय इतना डूब जाता कि वे जोर-जोरसे रोने लगते। कभी मन-ही-मन उन्हें अपने सामने पाकर आनन्दोद्रेकसे ठठाकर हँसने लगते। कभी उनके ध्यानके मधुर आनन्दका अनुभव करके जोरसे गाने लगते ॥३९॥ वे कभी उत्सुक हो बेसुरा चिल्ला पड़ते। कभी-कभी लोक-लज्जाका त्याग करके प्रेममें छककर नाचने भी लगते थे। कभी-कभी उनकी लीलाके चिन्तनमें इतने तल्लीन हो जाते कि उन्हें अपनी याद ही न रहती, उन्हींका अनुकरण करने लगते ॥४०॥ कभी भीतर-ही-भीतर भगवान्‌का कोमल संस्पर्श अनुभव करके आनन्दमें मग्न हो जाते और चुपचाप शान्त होकर बैठ रहते। उस समय उनका रोम-रोम पुलकित हो उठता। अधखुले नेत्र अविचल प्रेम और

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