श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 131, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंइति सूर्यवचः सर्वधर्मरूपं तु विश्रुतम् ॥४१
गोकर्णने कहा—भाई! मुझे इस बातका बड़ा आश्चर्य है—मैंने तुम्हारे लिये विधिपूर्वक गयाजीमें पिण्डदान किया, फिर भी तुम प्रेतयोनिसे मुक्त कैसे नहीं हुए? ॥३१॥ यदि गया-श्राद्धसे भी तुम्हारी मुक्ति नहीं हुई, तब इसका और कोई उपाय ही नहीं है। अच्छा, तुम सब बात खोलकर कहो—मुझे अब क्या करना चाहिये? ॥३२॥
प्रेतने कहा—मेरी मुक्ति सैकड़ों गया-श्राद्ध करनेसे भी नहीं हो सकती। अब तो तुम इसका कोई और उपाय सोचो ॥३३॥
प्रेतकी यह बात सुनकर गोकर्णको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे कहने लगे—‘यदि सैकड़ों गया-श्राद्धोंसे भी तुम्हारी मुक्ति नहीं हो सकती, तब तो तुम्हारी मुक्ति असम्भव ही है ॥३४॥ अच्छा, अभी तो तुम निर्भय होकर अपने स्थानपर रहो; मैं विचार करके तुम्हारी मुक्तिके लिये कोई दूसरा उपाय करूँगा' ॥३५॥
गोकर्णकी आज्ञा पाकर धुन्धुकारी वहाँसे अपने स्थानपर चला आया। इधर गोकर्णने रातभर विचार किया, तब भी उन्हें कोई उपाय नहीं सूझा ॥३६॥ प्रातःकाल उनको आया देख लोग प्रेमसे उनसे मिलने आये। तब गोकर्णने रातमें जो कुछ जिस प्रकार हुआ था, वह सब उन्हें सुना दिया ॥३७॥ उनमें जो लोग विद्वान्, योगनिष्ठ, ज्ञानी और वेदज्ञ थे, उन्होंने भी अनेकों शास्त्रोंको उलट-पलटकर देखा; तो भी उसकी मुक्तिका कोई उपाय न मिला ॥३८॥ तब सबने यही निश्चय किया कि इस विषयमें सूर्यनारायण जो आज्ञा करें, वही करना चाहिये। अतः गोकर्णने अपने तपोबलसे सूर्यकी गतिको रोक दिया ॥३९॥ उन्होंने स्तुति की—‘भगवन्! आप सारे संसारके साक्षी हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप मुझे कृपा करके धुन्धुकारीकी मुक्तिका साधन बताइये।' गोकर्णकी यह प्रार्थना सुनकर सूर्यदेवने दूरसे ही स्पष्ट शब्दोंमें कहा—‘श्रीमद्भागवतसे मुक्ति हो सकती है, इसलिये तुम उसका सप्ताह पारायण करो।' सूर्यका यह धर्ममय वचन वहाँ सभीने सुना ॥४०-४१॥ तब सबने यही कहा कि ‘प्रयत्नपूर्वक यही करो, है भी यह साधन बहुत सरल।' अतः गोकर्णजी भी तदनुसार निश्चय करके कथा सुनानेके लिये तैयार हो गये ॥४२॥
सर्वेऽब्रुवन् प्रयत्नेन कर्तव्यं सुकरं त्विदम् । गोकर्णो निश्चयं कृत्वा वाचनार्थं प्रवर्तितः ॥४२ तत्र संश्रवणार्थाय देशग्रामाज्जना ययुः । पङ्ग्वन्धवृद्धमन्दाश्च तेऽपि पापक्षयाय वै ॥४३ समाजस्तु महाञ्जातो देवविस्मयकारकः । यदैवासनमास्थाय गोकर्णोऽकथयत्कथाम् ॥४४ स प्रेतोऽपि तदाऽऽयातः स्थानं पश्यन्नितस्ततः । सप्तग्रन्थियुतं तत्रापश्यत्कीचकमुच्छ्रितम् ॥४५ तन्मूलच्छिद्रमाविश्य श्रवणार्थं स्थितो ह्यसौ ।
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