भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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कुछ भी परवाह न करके इस बच्चेको कैसी निस्सार शिक्षा दे दी? अवश्य ही तू हमारे शत्रुओंके आश्रित है ।।२६।। संसारमें ऐसे दुष्टोंकी कमी नहीं है, जो मित्रका बाना धारणकर छिपे-छिपे शत्रुताका काम करते हैं। परन्तु उनकी कलई ठीक वैसे ही खुल जाती है, जैसे छिपकर पाप करनेवालोंका पाप समयपर रोगके रूपमें प्रकट होकर उनकी पोल खोल देता है ।।२७।।

गुरुपुत्रने कहा—इन्द्रशत्रो! आपका पुत्र जो कुछ कह रहा है, वह मेरे या और किसीके बहकानेसे नहीं कह रहा है। राजन्! यह तो इसकी जन्मजात स्वाभाविक बुद्धि है। आप क्रोध शान्त कीजिये। व्यर्थमें हमें दोष न लगाइये ।।२८।।

नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! जब गुरुजीने ऐसा उत्तर दिया, तब हिरण्यकशिपुने फिर प्रह्लादसे पूछा—'क्यों रे! यदि तुझे ऐसी अहित करनेवाली खोटी बुद्धि गुरुमुखसे नहीं मिली तो बता, कहाँसे प्राप्त हुई?' ।।२९।।

प्रह्लाद उवाच

मतिर्न कृष्णे परतः स्वतो वा मिथोडभिपद्येत गृहव्रतानाम् । अदान्तगोभिर्विशतां तमिस्रं पुनः पुनश्चर्वितचर्वणानाम् ।।३०

न ते विदुः स्वार्थगतिं हि विष्णुं दुराशया ये बहिरर्थमानिनः । अन्धा यथान्धैरुपनीयमाना वाचीशतन्त्यामुरुदाम्नि बद्धाः ।।३१

नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाङ्घ्रिं स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः । महीयसां पादरजोऽभिषेकं निष्किञ्चनानां१ न वृणीत यावत् ।।३२

इत्युक्त्वोपरतं पुत्रं हिरण्यकशिपु रुषा । अन्धीकृतात्मा स्वोत्सङ्गान्निरस्यत महीतले ।।३३

आहामर्षरुषाविष्टः कषायीभूतलोचनः२ । वध्यतामाश्वयं वध्यो निःसारयत नैर्ऋताः ।।३४

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