श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्राणियोंपर दया करो। प्रेमसे उनकी भलाई करो। इसीसे भगवान् प्रसन्न होते हैं ॥२४॥ तुष्टे च तत्र किमलभ्यमनन्त आद्ये किं तैर्गुणव्यतिकरादिह ये स्वसिद्धाः । धर्मादयः किमगुणेन च काङ्क्षितेन सारंजुषां चरणयोरुपगायतां नः ॥२५
धर्मार्थकाम इति योऽभिहितस्त्रिवर्ग ईक्षा त्रयी नयदभौ विविधा च वार्ता । मन्ये तदेतदखिलं निगमस्य सत्यं स्वात्मार्पणं स्वसुहृदः परमस्य पुंसः ॥२६
ज्ञानं तदेतदमलं दुरवापमाह नारायणो नरसखः किल नारदाय । एकान्तिनां भगवतस्तदकिञ्चनानां पादारविन्दरजसाऽऽप्लुतदेहिनां स्यात् ॥२७
श्रुतमेतन्मया पूर्वं ज्ञानं विज्ञानसंयुतम् । धर्मं भागवतं शुद्धं नारदाद् देवदर्शनात् ॥२८
दैत्यपुत्रा ऊचुः प्रह्लाद त्वं वयं चापि नर्तेऽन्यं विद्महे गुरुम् । एताभ्यां गुरुपुत्राभ्यां बालानामपि हीश्वरौ ॥२९
बालस्यान्तःपुरस्थस्य महत्सङ्गो दुरन्वयः । छिन्धि नः संशयं सौम्य स्याच्चेद्विश्रम्भकारणम् ॥३०
आदिनारायण अनन्तभगवान्के प्रसन्न हो जानेपर ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो नहीं मिल जाती? लोक और परलोकके लिये जिन धर्म, अर्थ आदिकी आवश्यकता बतलायी जाती है—वे तो गुणोंके परिणामसे बिना प्रयासके स्वयं ही मिलनेवाले हैं। जब हम श्रीभगवान्के चरणामृतका सेवन करने और उनके नाम-गुणोंका कीर्तन करनेमें लगे हैं, तब हमें मोक्षकी भी क्या आवश्यकता है ॥२५॥ यों शास्त्रोंमें धर्म, अर्थ और काम—इन तीनों पुरुषार्थोंका भी वर्णन है। आत्मविद्या, कर्मकाण्ड, न्याय (तर्कशास्त्र), दण्डनीति और जीविकाके विविध साधन—ये सभी वेदोंके प्रतिपाद्य विषय हैं; परन्तु यदि ये अपने परम हितैषी, परम पुरुष भगवान् श्रीहरिको आत्मसमर्पण करनेमें ebook converter DEMO Watermarks*