भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1330

ऋषिं पर्यचरत् तत्र भक्त्या परमया सती । अन्तर्वत्नी स्वगर्भस्य क्षेमायेच्छाप्रसूतये ॥१४

ऋषिः कारुणिकस्तस्याः प्रादादुभयमीश्वरः³ । धर्मस्य तत्त्वं ज्ञानं च मामप्युद्दिश्य निर्मलम् ॥१५

तत्तु कालस्य दीर्घत्वात् स्त्रीत्वान्मातुस्तिरोदधे । ऋषिणानुगृहीतं मां नाधुनाप्यजहात् स्मृतिः ॥१६

भवतामपि भूयान्मे यदि श्रद्दधते वचः । वैशारदी धीः श्रद्धात्: स्त्रीबालानां च मे यथा ॥१७

जन्माद्याः षडिमे भावा दृष्टा देहस्य नात्मनः । फलानामिव वृक्षस्य कालेनेश्वरमूर्तिना ॥१८

नारदजीने कहा—'इसके गर्भमें भगवान्‌का साक्षात् परम प्रेमी भक्त और सेवक, अत्यन्त बली और निष्पाप महात्मा है। तुममें उसको मारनेकी शक्ति नहीं है' ॥१०॥ देवर्षि नारदकी यह बात सुनकर उसका सम्मान करते हुए इन्द्रने मेरी माताको छोड़ दिया। और फिर इसके गर्भमें भगवद्भक्त है, इस भावसे उन्होंने मेरी माताकी प्रदक्षिणा की तथा अपने लोकमें चले गये ॥११॥

इसके बाद देवर्षि नारदजी मेरी माताको अपने आश्रमपर लिवा गये और उसे समझा-बुझाकर कहा कि—'बेटी! जबतक तुम्हारा पति तपस्या करके लौटे, तबतक तुम यहीं रहो' ॥१२ ॥ 'जो आज्ञा' कहकर वह निर्भयतासे देवर्षि नारदके आश्रमपर ही रहने लगी और तबतक रही, जबतक मेरे पिता घोर तपस्यासे लौटकर नहीं आये ॥१३॥ मेरी गर्भवती माता मुझ गर्भस्थ शिशुकी मंगलकामनासे और इच्छित समयपर (अर्थात् मेरे पिताके लौटनेके बाद) सन्तान उत्पन्न करनेकी कामनासे बड़े प्रेम तथा भक्तिके साथ नारदजीकी सेवा-शुश्रूषा करती रही ॥१४॥

देवर्षि नारदजी बड़े दयालु और सर्वसमर्थ हैं। उन्होंने मेरी माँको भागवतधर्मका रहस्य और विशुद्ध ज्ञान—दोनोंका उपदेश किया। उपदेश करते समय उनकी दृष्टि मुझपर भी थी ॥१५॥ बहुत समय बीत जानेके कारण और स्त्री होनेके कारण भी मेरी माताको तो अब उस ज्ञानकी स्मृति नहीं रही, परन्तु देवर्षिकी विशेष कृपा होनेके कारण मुझे उसकी विस्मृति नहीं हुई ॥१६॥ यदि तुमलोग मेरी इस बातपर श्रद्धा करो तो तुम्हें भी वह ज्ञान हो सकता है। क्योंकि श्रद्धासे स्त्री और बालकोंकी बुद्धि भी मेरे ही समान शुद्ध हो सकती है ॥१७॥ जैसे ईश्वरमूर्ति कालकी प्रेरणासे वृक्षोंके फल लगते, ठहरते, बढ़ते, पकते, क्षीण होते और नष्ट हो जाते हैं—वैसे ही जन्म, अस्तित्त्वकी अनुभूति, वृद्धि, परिणाम, क्षय और विनाश—ये छः

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