श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथाष्टमोऽध्यायः नृसिंहभगवान्का प्रादुर्भाव, हिरण्यकशिपुका वध एवं ब्रह्मादि देवताओंद्वारा भगवान्की स्तुति
नारद उवाच
अथ दैत्यसुताः सर्वे श्रुत्वा तदनुवर्णितम् । जगृहुर्निर्वद्यत्वान्नैव गुर्वनुशिक्षितम् ॥१॥
अथाचार्यसुतस्तेषां बुद्धिमेकान्तसंस्थिताम् । आलक्ष्य भीतस्त्वरितो राज्ञ आवेदद्यद् यथा ॥२
श्रुत्वा तदप्रियं दैत्यो दुःसहं तनयानयम् । कोपावेशचलद्गात्रः पुत्रं हन्तुं मनो दधे ॥३
नारदजी कहते है—प्रह्लादजीका प्रवचन सुनकर दैत्यबालकोंने उसी समयसे निर्दोष होनेके कारण, उनकी बात पकड़ ली। गुरुजीकी दूषित शिक्षाकी ओर उन्होंने ध्यान ही न दिया ॥१॥
जब गुरुजीने देखा कि उन सभी विद्यार्थियोंकी बुद्धि एकमात्र भगवान्में स्थिर हो रही है, तब वे बहुत घबराये और तुरंत हिरण्यकशिपुके पास जाकर निवेदन किया ॥२॥
अपने पुत्र प्रह्लादकी इस असह्य और अप्रिय अनीतिको सुनकर क्रोधके मारे उसका शरीर थर-थर काँपने लगा। अन्तमें उसने यही निश्चय किया कि प्रह्लादको अब अपने ही हाथसे मार डालना चाहिये ॥३॥
क्षिप्त्वा परुषया वाचा प्रह्रादमतदर्हणम् । आहेक्षमाणः पापेन तिरश्चीनेन चक्षुषा ॥४
प्रश्रयावनतं दान्तं बद्धाञ्जलिमवस्थितम् । सर्पः पदाहत इव श्वसन्प्रकृतिदारुणः ॥५
हे दुर्विनीत मन्दात्मन्कुलभेदकराधम । स्तब्धं मच्छासनोद्धूतं नेष्ये त्वाद्य यमक्षयम् ॥६
क्रुद्धस्य यस्य कम्पन्ते त्रयो लोकाः सहेश्वराः ।
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