श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभवता हरे स वृजिनोऽवसादितो नरसिंह नाथ विभवाय नो भव ।।५५
विष्णुपार्षदा१ ऊचुः
अद्यैतद्धरिनररूपमद्भुतं ते दृष्टं नः शरणद सर्वलोकशर्म । सोऽयं ते विधिकर ईश विप्रशप्त- स्तस्येदं निधनमनुग्रहाय विद्मः ।।५६
वैतालिकोंने कहा—भगवन्! बड़ी-बड़ी सभाओं और ज्ञानयज्ञोंमें आपके निर्मल यशका गान करके हम बड़ी प्रतिष्ठा-पूजा प्राप्त करते थे। इस दुष्टने हमारी वह आजीविका ही नष्ट कर दी थी। बड़े सौभाग्यकी बात है कि महारोगके समान इस दुष्टको आपने जड़मूलसे उखाड़ दिया ।।५४।।
किन्नरोंने कहा—हम किन्नरगण आपके सेवक हैं। यह दैत्य हमसे बेगारमें ही काम लेता था । भगवन्! आपने कृपा करके आज इस पापीको नष्ट कर दिया। प्रभो! आप इसी प्रकार हमारा अभ्युदय करते रहें ।।५५।।
भगवान्के पार्षदों ने कहा—शरणागतवत्सल! सम्पूर्ण लोकोंको शान्ति प्रदान करनेवाला आपका यह अलौकिक नृसिंहरूप हमने आज ही देखा है। भगवन्! यह दैत्य आपका वही आज्ञाकारी सेवक था, जिसे सनकादिने शाप दे दिया था। हम समझते हैं, आपने कृपा करके इसके उद्धारके लिये ही इसका वध किया है ।।५६।।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे प्रह्लादानुचरिते दैत्यराजवधे नृसिंहस्तवो नामाष्टमोऽध्यायः ।।८।।
१. प्रा० पा०—सोऽतिक्रमन्। २. प्रा० पा०—सुस्तत्र।
१. प्रा० पा०—वंश्व्रभ्य०।
१. प्रा० पा०—हामनाः। २. प्रा० पा०—खरकेसरोल्बणो।
१. प्रा० पा०—पि तिलाम्बुमिश्रम्। २. प्रा० पा०—नुरुद्धां।
१. प्रा० पा०—एव। २. प्रा० पा०—रिह च दिति०। ३. प्रा० पा०—भिः सदा।
१. प्रा० पा०—पारिषदा।